Uncategorized

बाबूजी रुकिये, आप की चाय!

tsgt-superman

May 12, 2016

SHARES

दोस्त की शादी थी और मुझे जयपुर जाना था, रेलगाड़ी की प्रतीक्षा में मैं स्टेशन का छेत्रफल नाप रहा था और आखिर में थक कर एक बेंच पर बैठ गया। पर जब तक रेलगाड़ी आ नहीं जाती किसको चैन मिलता है, उठ कर पूछताछ केंद्र पर गया और वहाँ से निराशा ही हाथ लगी, ट्रेन 1 घंटा देरी से थी।

चूंकि वह स्टेशन बहुत बड़ा नहीं था इसलिए यात्री भी बहुत कम थे, मिला-जुला कर सन्नाटा ही था वहाँ पर। इस सन्नाटे को बच्चों का शोर भेद रहा था। बेंच से उठ कर देखा तो वह बच्चे पत्थरों से खेल रहे थे, उनकी दशा और फटे कपड़े देख कर यह पता चल रहा था कि वह बहुत गरीब परिवार के बच्चे थे।

सर्दी का मौसम था, प्लेटफार्म पर ठण्ड लग रही थी। मुझे चाय पीने की इच्छा हुई पर प्लेटफार्म पर कोई चाय वाला नज़र नहीं आ रहा था। एक चाय बेचने वाले की आवाज़ आ रही थी पर वह स्टेशन के बाहर था। मैं एक चाय के लिए अपना सारा सामान छोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकता था पर चाय पीने की इच्छा बढ़ती ही जा रही थी। मैंने सामने खेल रहे बच्चों में से एक को इशारा करके अपने पास बुलाया। उस बच्चे को 5 रूपये देकर मैंने चाय मंगवाई।

करीब आधा घंटे बाद भी जब वह बच्चा नहीं लौटा तो मैं समझ गया कि वह पैसे ले कर भाग गया है। इसी बीच ट्रेन के आने की घोषणा भी हो चुकी थी। मैं मन ही मन उस बच्चे को कोसने लगा था, मैं सोच रहा था कि ये सब आवारा होते हैं और चोरी चकारी तो इनका धंधा ही होगा। इन्हीं विचारों के साथ मैंने देखा कि ट्रेन प्लेटफार्म पर लग गई है। मैं अपना सामान ले कर अंदर जा ही रहा था तभी…

“बाबू जी आप की चाय!” उस बच्चे ने हांफते हुए कहा।

मैं पीछे घुमा तो देखा वही बच्चा, हाथ में चाय और माथे पर ठंडी में पसीना लिए खड़ा था। मैंने उससे पूछा कि इतनी देर क्यों कर दी आने में। उसने कहा-

“बाबूजी आप ने जो 5 रूपये दिए थे वो गुम हो गए थे, तो मैं चाय वाले के बर्तन मांज कर आप की चाय ले आया।”

-सौरभ श्रीवास्तव (क्वोरा पर)

(काल्पनिक चित्र)

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...