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मेरी कहानी: बेटा आजकल तो इंसान एक दूसरे की परवाह नहीं करते हैं पर मैं बूढा हूँ, मैं उस दौर का आदमी हूँ जब इंसानियत ज़िंदा थी

ashu

October 14, 2016

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कल मेरी मुलाक़ात 84 साल के छोटेलाल जी से हुई, राजपुर रोड, देहरादून के पास वो कुछ कुत्तों को बिस्कुट खिला रहे थे और दूध पिला रहे थे। उनके दूर से आता देख ही सारे कुत्तों ने प्यार से अपनी पूँछ हिलाना शुरू कर दिया और वो सब छोटेलाल जी के इर्द-गिर्द मंडराने लगे। ऐसा लग रहा था मानो वो सारे बेज़ुबान जानवर उनकी प्रतीक्षा में बहुत देर से खड़े हों और छोटेलाल जी के देरी से आने पर प्यार से उनसे शिकायत कर रहे हों।

छोटेलाल जी की कमर झुकी हुई थी, उनको सर उठाकर देखने में भी दिक्कत हो रही थी पर इन जानवरों के लिए उनका प्यार देखते ही बनता था। वो बूढ़े ज़रूर थे पर उनकी हिम्मत मुझसे कहीं ज़्यादा जवान थी। छोटेलाल जी फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंडिया से रिटायर थे, उनको 4000 रुपये मासिक पेंशन मिलती थी, जिसे वो राजपुर रोड पर आने वाले ग़रीब लोगों और बेज़ुबान जानवरों पर ख़र्च कर देते थे।

जब मैंने उनकी मदद करनी चाही तो उन्होंने मना कर दिया, वो अंग्रेज़ी में बात कर रहे थे और उनके जज़्बे को देखकर मैं आश्चर्यचकित था। मैंने उनसे पूछा कि वो इन जानवरों को क्यूँ खाना खिला रहे हैं और बदले में जो जवाब मुझे मिला उसने मुझे बहुत कुछ सिखा दिया, उन्होंने कहा,

“बेटा आजकल तो इंसान एक दूसरे की परवाह नहीं करते हैं पर मैं बूढा हूँ, मैं उस दौर का आदमी हूँ जब इंसानियत ज़िंदा थी। मैंने वो दौर देखा है जब लोग खुद भूखे सोकर अपने पड़ोसी का पेट भरते थे, ज़माना भले बदल गया है पर मैं तो वही इंसान हूँ ना बेटा। इन भूखे जानवरों और लोगों की मदद कर के मैं इस दौर में वो पुराना वाला ज़माना जी लेता हूँ और इसमें मुझे बड़ी ख़ुशी मिलती है।”

मैंने उनसे एक फ़ोटो लेने का अनुरोध किया और वो मान गए, वो बड़ी मुश्किल से सीधे खड़े हुए और एक उम्मीद भरी मुस्कराहट से मेरी ओर देखा। मैंने उनसे दुबारा मिलने का वादा कर के अलविदा ले लिया, जाते-जाते मैंने उनसे यह भी कहा कि उनकी कहानी मैं पूरी दुनिया को बताऊंगा।

उम्मीद करता हूँ आप लोग भी उनकी कहानी पूरी दुनिया को बताएंगे।

-अंकित शर्मा द्वारा भेजी गई

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