मेरी कहानी

मेरी कहानीः मेरी बेटी कहती है कि मां ये आपकी लड़ाई नहीं है

तर्कसंगत

June 14, 2017

SHARES

मेरे और बेटी दोनों के विचार अलग-अलग हैं और हम अक्सर बहस करते रहते हैं. जब हम बाहर निकलते हैं तो कई बार हालात अटपटे हो जाते हैं. उदाहरण के तौर पर अगर हम एयरपोर्ट पर हैं और मैं किसी यात्री को एयरलाइन स्टाफ से उलझते हुए देखती हूं तो मुझे लगता है कि मामला सुलझाना मेरी ज़िम्मेदारी है.

मेरी किशोरी बेटी मुझे ये कहते हुए खींच ले जाती है कि, “मां, ये आपकी लड़ाई नहीं है, ये पर्सनल नहीं है. वादा करो कि आप इसमें नहीं पड़ोगी.”

मैं नई पीढ़ी की ऐसी प्रतिक्रिया को लेकर हमेशा उलझन में रहती हूं. क्या ये उदासीनता है? क्या ये विरक्ति है? हमारी पीढ़ी को बताया गया था कि ऐसा मामले हमेशा व्यक्तिगत होते हैं.

घर और काम पर युवा पीढ़ी को देखते हुए मैं ये मानती हूं कि हम मानवीय जाति के क्रांति के दौर से विकास के दौर में आ गए हैं.

हमारी पीढ़ी में नैतिक मूल्य थे, मेहनत थी और हमने अभाव देखा था. इससे ज़्याद कुछ नहीं था. हर दिन एक संघर्ष था. हर मुद्दा पर्सनल था और हर उपलब्धि हिमालय पर्वत चढ़ने जैसी थी. क्योंकि हमारे सामने मुश्किलें बहुत थीं.

हमारे सामने संघर्ष था

चाहें वो एक बड़े परिवार में युवती होना हो, पुरुषों से भरे कार्यस्थल पर एक महिला होना हो या फिर एक कामकाजी मां होना जो कई काम एक साथ करने में जुटी रहती है. चाहें कामकाजी जगह या फिर घर, नज़र में आना संघर्ष था.

हमें नेतृत्व, मार्गदर्शक और अपने हीरो तलाशना सिखाया गया था. ताकि हमें सलाह मिल सके और हमारी आवाज़ सुनी जा सके.

चीज़ें बदलती रहती हैं और ये स्वभाविक है. नई पीढ़ी पर आते हैं. मैं एक मां भी हूं और एक बॉस भी. मैंने अब एक ‘हेलिकॉप्टर मां’ और एक दयालु मार्गदर्शक की जगह ले ली है.

आत्म आश्वस्त पीढ़ी

नई दौर में सबकुछ बदल गया है. नई, युवा और आत्म-आश्वस्त, आत्मविश्वास से भरी हुई पीढ़ी को नज़र में आने के लिए छत से चिल्लाने की ज़रूरत महसूस नहीं करती.

वे सब आत्मसम्मान से भरे हुए हैं. उन्हें मार्गदर्शक या गाइड की ज़रूरत नहीं है. अपनी मदद स्वयं करना ही उनका हर समस्या का समाधान है.

कार्पोरेट सीढ़ी चढ़ते हुए सफल होना, बॉस से तारीफ़ पाना या शीर्ष पर पहुंचना उनके जीवन का अंतिम उद्देश्य नहीं है. मैं जो कह रही हूं हो सकता है वो पूरी तरह सही न हो लेकिन इसकी वजह से युवा पीढ़ी का संपर्क टूट रहा है.

नई पीढ़ी के काम करने के अपने तरीके हैं. वो अपने उद्देश्य खुद निर्धारित कर रहे हैं, अपना भविष्य खुद तय कर रहे हैं. वो ज़्यादा ख़तरे उठा रहे हैं और उद्यमशीलता अपना रहे हैं. उन्हें दुनिया की समस्याओं से कोई लेना देना नहीं है.

वो बस ख़ुद में विश्वास करते हैं. वो मैं वाली पीढ़ी हैं. लेकिन ये अहंकारी या आत्म मुग्धता नहीं है बल्कि ये सकारात्मकता और प्रगतिशीलता है.

यही वजह है कि हम पिछली पीढ़ी के लोग नई शताब्दी के बच्चों से जुड़ नहीं पा रहे हैं. हमें जो भी कुछ सिखाया गया था उसे नई पीढ़ी चुनौती दे रही है.

नई पीढ़ि की नई उम्मीदें

नई पीढ़ी को कार, बंगला या बसा हुआ घर नहीं चाहिए. वो अपने पहले पार्टनर के साथ जीवन भर का साथ भी नहीं देखते. बल्कि वो तो बड़ी कंपनियों की नौकरियां छोड़कर अपना कुछ करने को आतुर हैं. हो सकता है कि वो सब भाग्यशाली हों, अच्छे समय में पैदा हुए हैं लेकिन वो इससे अपने आपको भीतरी और बाहरी रूप से विकसित ही कर रहे हैं.

अब समय आ गया है कि हमारी पीढ़ी भी समझे कि मुद्दे हमारे अपने नहीं है. दुनिया बदल गई है और अब हमें इसे स्वीकार करना चाहिए. नई पीढ़ी हमारी ही शानदार कृति है. हमें इस पर गर्व करना चाहिए. अभिभावकों के लिए इस नई पीढ़ी के साथ चलना मुश्किल हो जाता है. हमें फासले कम करने के लिए रास्ता निकालना होगा.

मैं हाल ही में अपनी बेटी को मैडम तुसाद लेकर गई थी. मैंने उससे कहा कि तुम अपने हीरो के साथ तस्वीर खिंचा लो. उसने मुझसे कहा कि मैं अपनी हीरो ख़ुद हूं. और तब मैं समझ गई कि ये पीढ़ी दूसरों की कामयाबियों, हमारे संस्थानों या क़ायदों के साथ नहीं चलने वाली है. ये अपने रास्ते और तरीके ख़ुद बनाएगी.

-मनीषा गिरोत्रा

Submitted By – Mansi

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...