मेरी कहानी

मेरी कहानीः मैंने अपनी ख़ूबसूरत बीवी खो दी और डॉक्टरों ने मुझे मेरे 4 महीने 28 दिन के बच्चे का शव सौंपा

तर्कसंगत

June 19, 2017

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ये मेरी पत्नी के साथ ली गई आख़िरी सेल्फी है. नए साल के मौके पर हमने मेरे परिवार के साथ जश्न मनाया था और कई उम्मीदों और सपनों के साथ नए साल की शुरूआत की थी.

लेकिन भगवान को कुछ और ही मंज़ूर था. मेरी पत्नी सात जनवरी को सुबह छह बजकर चालीस मिनट पर अन्ना नगर के पास बाइक से गिर गई. हम उन्हें सुंदरम अस्पताल लेकर गए और डॉक्टरों ने उनके सिर का सीटी स्कैन किया.

डॉक्टरों ने उनकी हालत बहुत गंभीर बताई. उनके सिर में बाईं और सूजन आ गई थी. हमसे उन्हें अपोलो अस्पताल ले जाने के लिए कहा गया. अपोलो अस्पताल के डॉक्टरों ने कहा कि उनके सिर का ऑपरेशन किया जाना है ताकि खून के थक्के को हटाया जा सके और उनकी जान बचाने की कोशिश की जा सके.

ऑपरेशन के बाद ड़ॉक्टरों की प्रतिक्रिया बहुत सकारात्मक नहीं थी. उन्होंने बताया कि उनके दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया है और वो क़रीब पांच महीने की गर्भवती हैं. हादसे के बाद भी हमारा बच्चा ज़िंदा था. मां और बच्चा वेंटीलेटर मशीन के ज़रिए जीने की हरसंभव कोशिश कर रहे थे.

पांच दिन बाद, बारह जनवरी को दोपहर साढ़े तीन बजे हमारा बच्चा ज़िंदगी की जंग हार गया. डॉक्टरों ने कहा कि मेरी पत्नी की जान बचाने के लिए उन्हें भ्रूण को निकालना होगा.

13 जनवरी को रात के ढाई बजे डॉक्टरों ने मुझे मेरे बेटे का शव सौंपा. मेरा दिल टूट गया था और मैं बुरी तरह रो रहा था. किसी को भी अपने बच्चे को इस तरह न देखना पड़े.

डॉक्टरों ने मुझे अंगदान की सलाह दी. उमा के पिता, भाई और मैंने दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर किए क्योंकि उमा और मैंने पहले ही कई बार अंगदान के बारे में लंबी चर्चाएं की थीं. लेकिन हमें इसके लिए सही प्रक्रिया की जानकारी नहीं थी. हमने अपने बेटे के ज़रूरी अंग दान कर दिए और मेरी पत्नी को सुबह छह बजे अपोलो अस्पताल की दूसरी ब्रांच में शिफ्ट कर दिया गया.

उसके शरीर ने भी जवाब देना शुरू कर दिया. हेमेग्लोबिन का स्तर और पल्स गिर गईं. हम जान गए कि अब उसका भी आख़िरी वक़्त क़रीब आ गया है. डॉक्टरों ने उसे स्थिर करने की हर संभव कोशिश की ताकि अंगदान किया जा सके. उसके अंग कम से कम आठ लोगों का जीवन बचा सकते थे.

13 जनवरी की सुबह नौ बजकर पैंतीस मिनट पर मेरी ख़ूबसूरत पत्नी दिल के दौरे से ज़िंदगी की जंग हार गई. मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी ज़िंदगी और आत्मा का एक हिस्सा चला गया. लेकिन हम अब भी कई औपचारिकताएं पूरी करनी थीं.

उसके भाई ने हमारे परिजनों और दोस्तों के ये दुख की ख़बर सुनाई और हमने उसी शाम साढ़े पाँच बजे उनका अंतिम संस्कार कर दिया. हमने सिर्फ़ एसएमएस किए थे. उसे अंतिम विदाई देने के लिए क़रीब डेढ़ सौ लोग पहुँचे. इससे हमें अहसास हुआ कि उसने कितनी ज़िंदगियों को छुआ था. मेरी मनोदशा उस समय बहुत ख़राब थी. मेरे पास सिर्फ़ आंसू और दर्द था.

हम 23 अगस्त 2007 से साथ थे और हमने 21 अगस्त 2016 को शादी की थी.  हम नौ साल से साथ लेकिन हमारी शादी को सिर्फ़ छह महीने ही हुए थे. हमारे घर में पहला बच्चा आने वाला था. मैंने भगवान से पूछा कि उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया. अब उसके बिना मैं कैसे जिऊंगा. मेरे मन में कितने सारे सवाल हैं और मेरे पास कोई जवाब नहीं है. मैं कहां जाऊं, क्या करूं?

मैं अपनी ये कहानी क्यों कह रहा हूं?

जब भी हम ड्राइव करें, सुरक्षा का पूरा ख़्याल रखें. मैंने हेलमेट पहना था लेकिन मैंने अपनी पत्नी के लिए हेलमेट नहीं ख़रीदा था. ये बहुत ज़रूरी है कि आपके साथ जो भी बैठा है उसने हेलमेट पहना हो. ज़िंदगी के सामने हेलमेट की कीमत कुछ भी नहीं है. हमें नहीं पता होता कि अगले ही पल क्या होने वाला है. इसलिए सुरक्षा को हमेशा प्राथमिकता देनी चाहिए.

यदि भगवान ने किसी जान को लेने का फ़ैसला कर लिया है तो कोई पैसा या ताक़त उसे नहीं बचा सकती. कभी-कभी तो दुआएं भी काम नहीं आतीं. जिन लोगों से आप प्यार करते हैं और जिनकी परवाह करते हैं उनके साथ हर पल को खुलकर जियो. क्योंकि हम सबके पास समय बहुत कम है.

अंत में बस आप सबसे यही गुज़ारिश करूंगा कि अंगदान के लिए पंजीकरण कराएं. हम किसी को खो देने के दर्द और मुश्किलों को जानते हैं. लेकिन अगर हम किसी और की जान बचा पाए तो इस दर्द से कुछ निजात पा सकते हैं.


Story By – Karthick Kv

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