मेरी कहानी

मेरी कहानी : मेरा लड़का 7 महीने का है और उसकी सही तरीके से देखभाल करना मेरी जिम्मेदारी है साथ ही मेरे लिए मेरा काम भी पहले है.

तर्कसंगत

July 17, 2017

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मुझे याद है बचपन में अपने भाई और बहनों के साथ मिलकर मैं चोरपुलिस का खेल खेलती थी तभी से मेरी ये ख्वाहिश रही की मैं एक पुलिस अधिकारी बनूं. मेरे परिवार को ये समझाना बेहद मुश्किल था क्योंकि ये ऐसी नौकरी है जिसे पुरुषों के लिये समझा जाता है महिलाओं के लिये ये काम थोड़ा जटिल समझा जाता है. लेकिन पुलिस में काम करना ही मेरा सपना था और आज मैं इसी सपने को जी रही हूं.

शुरुआत में मुझे फ्रेशर समझा गया लेकिन मेरे सीनियर अधिकारी ने मुझपे भरोसा जताया जिससे मेरा हौसला बढ़ गया. एक बार की बात है जब मैं किसी त्योहार के दौरान फंस गयी थी जहां भीड़ बेकाबू हो रही थी. हमारे यहां वैसे भी त्योहारों में कुछ ज्यदा ही शोरशराबा होता है और लोग कभी कभी खुद पे काबू नहीं रख पाते जिससे थोड़ी अफरातफरी मच जाती है. ऐसे शोर में बूढ़े व्यक्ति, मरीज और जानवरों को काफी दिक्कतें होती हैं यही नही त्योहार के नाम पर ध्वनि प्रदुषण भी बहुत होता है.

गणेश चतुर्थी के अवसर पर एक बार भीड़ बेकाबू हो गयी थी और वो लाउड स्पीकर, ढ़ोल नगाड़े की आवाज़ कम ही नहीं कर रहे थे. लोगों ने शराब पी रखी थी औऱ वो देर रात तक नाच रहे थे. एक बूढ़े दंपत्ति जो अपने बिमार पोते के साथ रह रहे थे उन्होंने जब हमें पास देखा तो मदद के लिये पुकारा. उनके आग्रह करने पर मैने उनकी मदद करने को ठान ली. मेरे वरिष्ठ अधिकारी को किसी जरुरी काम से जाना था इसलिए मैंने अपने साथी पुलिसकर्मी के साथ उन लोगों के पास जाकर गाना बजाना बंद करने को कहा. वो लोग हमारी बेइज्जती करने लगे और गाली देने लगे. लेकिन हमें कैसे भी उन्हें और उनके द्वार मचाये जा रहे शोर को शांत कराना ही था. उनमें से एक तो ये सोच कर पागल हो गया की लेडिज़ कॉन्सटेबल उसे कैसे बोल सकती है और वो बहुत ही बुरे तरीके से हमें देखने लगा. तभी पुलिस वैन वहां आ गयी और वो सारे वहां से भाग गये. इस तरीके का बुरा व्यवहार देखकर मुझे बहुत निराशा हुई. ऐसे केस में अक्सर महिलाओं को वापस कर दिया जाता है लेकिन हम इतनी जल्दी हार मानने वालों में से नहीं थे.

मैं खुशी खुशी अपने काम को अंजाम तक पहुंचा रही थी. मैने अरेंज मैरेज की है और मेरे पति बहुत ही अच्छे इंसान हैं शायद लाखों में एक. वो मुझसे कहते हैं की पुलिस में नौकरी करना उनका भी सपना था जो पुरा हो न सका लेकिन वो मुझे एक पुलिस कॉन्सटेबल के तौर पर देख कर बहुत खुश हैं. वो कहते हैं कि मैं गौरवानवित होकर कह सकता हूं कि मेरी धर्मपत्नी मेरे सपने को जी रही है. वो नासिक में व्यापारी हैं जबकि मैं कल्याण में पोस्टेड हूं इसलिए हम दोनों बहुत मुश्किल से मिल पाते हैं.

मेटरनल लीव के बाद मैं फिर से काम पर आ गयी. मेरा लड़का 7 महीने का है और उसकी सही तरीके से देखभाल करना मेरी जिम्मेदारी है साथ ही मेरे लिए मेरा काम भी पहले है. मुझे याद है एक ट्रेनिंग सेशन के दौरान जब मि. प्रताप दिघावकर ने हमारी टीम को कुछ रेप और दहेज के केस को सुलझाने के लिए सम्मानित किया था. वो हमारे काम की तारिफ कर प्रोत्साहित करते हैं और साथ ही हमें काफी प्रेरणा और उत्साह से सराबोर कर देते हैं. भले ही तरिका साधारण हो या कारण छोटा पर देशसेवा करना हमारे लिए वाकई में गर्व की बात है. लेकिन साथ ही हर दिन क्रूर और जघन्य अपराधों से दो चार होना दिल को ठेस भी पहुंचाता है. छोटी छोटी लड़कियों के साथ रेप होना जैसे कितने अपराध समाज में नकारात्मकता लाते हैं.

हमारे समाज में लड़कों की परवरिश ही ऐसे होती है जहां वो औरतों को बस एक वस्तु की तरह समझते हैं. हमलोगों के सामने 3 साल की उम्र की बच्चियों के साथ रेप के केस भी आते हैं. महिलाओं को दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता है, एसिड अटैक जैसी घिनौनी करतूत की जाती है, उन्हें मारा जाता है, शारीरिक पीड़ा दी जाती है ऐसे न जाने कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ता है और वो महिलाएं बेबस और लाचार होकर सब झेलती हैं क्योंकि वो जाएं भी तो कहां. एक औरत और उसकी बेटी जिन्हें उसके ससुराल वालों ने मारा था और लगातार यातना दे रहे थे, उनके चंगुल से जब हमने उन्हें बचाया तो वो हमारी टीम का शुक्रिया करते नहीं थक रही थी और उसने कहा की ऐसा काम करते रहो जिससे हम जैसे साधारण औरतों का भरोसा आप पर बढ़ेगा और साथ ही आप जैसे बनने की प्रेरणा मिलेगी. ये हमारी टीम के लिए एक शानदार उपलब्धि थी.

हम एक बेहतर कल की ओर जा रहे हैं लेकिन हमारी सफलता में चार चांद तभी लगेगा जब महिलाएं हर प्रोफेशन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेंगी. मुझे लगता है कि कोई भी औरत एक सही कदम उठाकर बदलाव ला सकती है और एकसाथ हुईं तो बदलाव होकर रहेगा.”

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