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गरीबों की मसीहा कॉन्स्टेबल स्मिता तांडी

तर्कसंगत

July 20, 2017

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छत्तीसगढ़ पुलिस में कॉन्स्टेबल स्मिता तांडी ने समाजसेवा की ऐसी मिसाल पेश की है जिससे हर हिंदुस्तानी नारी का सिर फक्र से उंचा उठ जायेगा. कांस्टेबल स्मिता तांडी महिला सेल में काम करती हैं, लेकिन जरूरत के वक्त वो किसी की भी मदद के लिये तैयार रहती हैं. पिछले तीन सालों के दौरान वो आर्थिक रुप से पिछड़े सैकड़ों लोगों का इलाज करा चुकीं हैं. इतना ही नहीं जब किसी मरीज को खून की जरूरत होती है तो ब्लड बैंक के बजाय वो स्मिता तांडी से सम्पर्क करता है. वक्त पर लोगों को मदद मिल सके इसके लिये स्मिता तांडी ने फेसबुक और ट्विटर परजीवनदीप’ (Jivandeep) नाम से एक ग्रुप बनाया है. आज लाखों लोग इस ग्रुप के सदस्य हैं. राष्‍ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर उन्हें नारी शक्ति पुरस्कार 2016 से नवाज़ा था.

2013 में जब स्मिता पुलिस ट्रेनिंग ले रही थीं, तब घर पर उनके पिता की तबीयत खराब हो गई. उनके पिता भी पुलिस में थे लेकिन बीमार पड़ने के बाद गरीबी के कारण सही समय पर इलाज नहीं मिलने से उनकी मौत हो गई थी. अपने पिता की मौत से सबक लेते हुए स्मिता तांडी ने गरीब और अभाव ग्रस्त लोगों की मदद करने की ठानी और इस मिशन में जुट गई क्योंकि उन्होने महसूस किया कि देश में हजारों लोग पैसों के अभाव में जान गंवा देते हैं.

स्मिता ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर 2014 में गरीबों की मदद के लिए एक ग्रुप बनाया. इस ग्रुप के जरिए उन्होंने पैसा जमा करना शुरू किय. स्मिता और उनके दोस्त उन लोगों की मदद करते हैं जिन्हें जानकारी के अभाव में सरकारी मदद नहीं मिल पाती. जब भी उन्‍हें ऐसे किसी व्‍यक्ति के बारे में पता चलता वे मदद करने जा पहुंचती. इसके बाद स्मिता फेसबुक पर आईं और यहां उन्‍हें उम्‍मीद से ज्‍यादा रिसपांस मिला. वे लोगों की तस्‍वीरें और उनकी मदद के लिए फेसबुक वॉल पर लिखती थीं. धीरेधीरे लोगों ने उनकी बात सुनी और ऐसे लोगों को मदद मिलने लगी.

इस समूह में नौकरी पेशा से लेकर छात्र, डॉक्टर तक शामिल हैं। ये लोग पहले मरीज की वास्तविक जाँच कर लेते हैं कि क्या सच में वह आर्थिक रूप से कमज़ोर है? इसके बाद उनकी बैंक पासबुक का एक फोटो अपने पास रख लेते हैं. जब दानदाताओं से संपर्क किया जाता है तो उन्हें सीधे उस परिवार के बैंक खाते अथवा अस्पताल के बैंक खाते का नंबर दे दिया जाता है, ताकि वह सीधे अपना पैसा वहाँ दे सके. अर्थात मरीज और दानदाता के बीच होने वाले पैसों के लेनदेन में ये लोग बीच में नहीं पड़ते.  अपने काम में आने वाली परेशानियों के बारे में स्मिता बताती हैं कि दुनिया में हर तरह के लोग हैं. इस कारण कुछ लोग उनको फेसबुक और वाट्स ग्रुप में ट्रोल करते हैं, बावजूद स्मिता ऐसे लोगों को जवाब देना बखूबी जानती हैं. पहले तो वो ऐसे लोगों को नजरअंदाज करने की कोशिश करती हैं लेकिन जब वो नहीं मानते हैं तब उनके कमेंट का स्क्रीनशॉट लेकर उसे फेसबुक पर अपलोड कर देती हैं.

आज स्मिता के इस काम में उनका परिवार तो साथ देता ही है वहीं उनको पुलिस स्टॉफ भी पूरी मदद करता है. पुलिस महकमें से जुड़े कई लोग जरूरत के समयजीवनदीपग्रुप की आर्थिक मदद भी करते हैं. इसके अलावा किसी मरीज को स्मिता की मदद की जरूरत होती है तो उनके सीनियर अफसर उनको कहीं भी आने जाने से नहीं रोकते. इस वक्त स्मिता नौकरी, समाज सेवा के साथसाथ अपनी अधूरी पढ़ाई को भी पूरा कर रही हैं.

तर्कसंगत इनकी कोशिशों को सलाम करता है.

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