ख़बरें

अपने समुदाय के लोगों को सम्मान दिलाने के लिए संघर्ष करती देश की पहली ‘ट्रांस्जेंडर जज’

तर्कसंगत

August 10, 2017

SHARES

अरुणिमा भट्टाचार्य

जोयीताः ये नाम ही विजय का प्रतीक है. जीवन की चुनौतियों पर विजय पाने वालों को ही जोयीता कहा जाता है. ऐसे बहुत ही कम लोग होते हैं जो अपने नाम का अर्थ उनके जीवन में झलकता है.

पश्चिमी बंगाल के उत्तर दीनाजपुर ज़िले की ट्रांस्जेंडर अधिकार कार्यकर्ता और पहली ट्रांस्जेंडर जज जोयीता मंडल ऐसे ही लोगों में से एक हैं जिन्होंने जीवन के संघर्षों और चुनौतियों पर विजय प्राप्त कर एक मिसाल कायम की है.

तर्कसंगत ने जोयीता से उनके जीवन और चुनौतियों पर लंबी बातचीत की. उन्होंने अपने असंख्य अनुभव साझा किए और उस भेदभाव पर भी बात की जिसका सामना ट्रांस्जेंडर हर दिन करते हैं.

जब वो जोयोंतो थीं

“अब तक आपना जिन हालातों का सामना किया उनके बारे में बताइये.”

जब जोयीता से ये सवाल पूछा गया तो वो कुछ देर तक ख़ामोश रहीं और फिर बोलीं, “क्या आपने कभी अपने गले के इर्द गिर्द एक घुटन महसूस की है, ऐसा कंपन जो आपको सांस न लेने देता हो? मैंने बचपन से इस अहसास का सामना किया है और मैं नहीं जानती थी कि इस स्थिति से कैसे निकलूं.”

“मैं अपने अभिभावकों का अकेला बेटा हूं. उन्होंने मेरा नाम जोयोंतो रखा. मेरी दो बड़ी बहनें हैं. आप एक मध्यमवर्गीय बंगाली परिवार के इकलौते बेटे होने का महत्व समझ सकते हैं. मेरे माता-पिता की सभी उम्मीदों और आकांक्षाओं को मुझसे बांध दिया गया. और एक मैं थी, जो अपनी ही पहचान के लिए संघर्ष कर रही थी. एक पहचान जिसमें मैं ख़ुद को सहज महसूस कर सकूं.”

जोयीता के सामने हालात इतने असहज और मुश्किल थे कि उन्हें 2009 में अपना घर छोड़ देना पड़ा.

“लेकिन मुझे ग़लत ना समझें. ऐसा नहीं था कि मेरे और मेरे परिजनों के बीच प्यार न बचा हो. मैं उन्हें बहुत प्यार करती हूं और आज भी मुश्किल में उनकी सलाह मानती हूं. लेकिन अपनी पहचान को पाने के लिए मुझे अपने घर से बाहर निकलना ही था. अगर मैंने उस दिन घर न छोड़ा होता तो जो भी थोड़ा बहुत मैंने हासिल किया है वो मैं कभी हासिल न कर पाती.”

जोयीता ने जीपनयापन के लिए कोलकाता में एक बीपीओ में नौकरी शुरू कर दी थी लेकिन उन्हें वहां इतने बुरे अनुभव हुए कि वो जीवन में कुछ करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ हो गईं.

“मेरे सहकर्मी हर दिन मेरा मज़ाक उड़ाते थे. हालात इतने भयावह हो गए थे कि वाशरूम जाने जैसे सामान्य काम भी मेरे लिए बड़ी समस्या बन गए थे. तब मैंने फैसला लिया कि अब कोलकाता छोड़ने का समय आ गया है.”

और फिर जोयोंतो ने ख़ुद को जला लिया और अपनी राख से जोयीता को पैदा किया.

जोयीता का दूसरा घर है उत्तर दीनाजपुर

जोयीता पश्चिम बंगाल सीमा पर बसे एक छोटे से कस्बे इस्लामपुर आ गईं. उत्तर दीनाजपुर के इस क़स्बे में उनके कुछ सहयोगी पहले से रहते थे.

“मैंने काम शुरू किया लेकिन फिर मेरे इर्द गिर्द जो लोग थे उनके मन में मेरे प्रति दुर्भावना थी. मैं जानती हूं कि उनकी प्रतिक्रिया अज्ञानता की वजह से थी लेकिन ऐसी स्थिति का हर दिन सामना करना मेरे लिए बहुत ही मुश्किल था.”

जोयीता कहती हैं कि जिन दोस्तों पर वो निर्भर थीं वो भी बहुत ज़्यादा मददगार साबित नहीं हुए. उस समय उनकी पगार सिर्फ़ पांच हज़ार रुपए थी और उनके लिए पेट भरना और भी मुश्किल होता जा रहा था.

“मैं खाली पेट रहती और कई बार तो बस स्टॉप पर ही रात गुज़ारनी पड़ती. मेरे पास चुकाने के लिए पैसे होते तब भी होटल मुझे खाना खिलाने या कमरा देने के लिए तैयार नहीं होते.”

लेकिन इन सब मुश्किलों के बावजूद जोयीता रुकीं नहीं. “दस जनवरी 2010 को मैंने अपनी संस्था की शुरुआत की. इसका नाम खा दीनाजपुर नोतुन आलो सोसायटी. इसका काम उस इलाक़े के लोगों के लिए रोशनी की किरण लाना था.”

“इस संस्था के ज़रिए मैं अपने समुदाय के बहुत से लोगों के संपर्क में आई और हमने एक दूसरे की मदद करनी शुरू कर दी. कोलकाता में रहते हुए जो ज्ञान और जागरुकता मैंने हासिल की थी वो मेरे बहुत काम आई.”

2012 में जोयीता और उनकी संस्थान को एक वैश्विक फंड की वित्तीय मदद से चल रहे पहचान प्रोजेक्ट का प्रभार मिल गया. वो कहती हैं, “इस प्रोजैक्ट के ज़रिए ही मैं ज़िला प्रशासन में अपनी पहचान बना पाई.”

जोयीता के काम को मिली नई दिशा

सहजता, सरलता और स्पष्टता जोयीता के चरित्र की ख़ासियत है. वो कहती हैं, “मैंने देखा कि मेरे समुदाय के लोगों को अपने अधिकारों के लिए लड़ना पड़ रहा है. अपने अधिकारों के लिए लड़ना सही है लेकिन मुझे अहसास हुआ कि हमें सिर्फ़ अपने लिए ही नहीं बल्कि समूचे समाज के फ़ायदे के लिए प्रयास करने चाहिए.”

उनका पहला प्रोजैक्ट इलाक़े के बुजुर्गों के लिए वृद्धाश्रम एज इंडिया बनाना था. उनकी संस्था की ख़ास बात ये है कि इसके सभी सदस्य ट्रांस्जेंडर ही हैं. इसके बाद उन्होंने अपने इलाक़े की वेश्याओं के लिए काम करना शुरू किया और उनके पहचान पत्र बनाने पर ध्यान केंद्रित किया. प्रशासन वेश्याओं के लिए काम करने को लेकर बहुत उत्सुक नहीं था. जोयीता ने ये ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली.

“मेरे इन्हीं कामों के बाद लोगों को लगा कि वो मुझसे और मेरे काम से जुड़ सकते हैं. उन्हें महसूस हुआ कि मैं सभी के लिए काम कर रही हूं. मेरे इन्हीं सामाजिक कार्यों की वजह से मुझे लोक अदालत में सामाजिक कार्यकर्ता के तौर पर नियुक्त किया गया. जब लोग कहते हैं कि वो मेरी लैंगिक पहचान से ऊपर उठकर मेरे काम और समाज में जो बदलाव में लाना चाहती हूं उसके लिए मुझे पहचानते हैं तो मुझे बहुत अच्छा लगता है.”

जोयीता फिलहाल अल्पसंख्यक सेल के सुपरवाइज़री बोर्ड की सदस्य हैं.

“अगर आप मुझसे पूछे तो मैं कहूंगी कि इस्लामपुर के लोगों ने मुझे और मेरे काम को स्वीकार किया है. अब मैं उनके लिए उत्सुकता की कोई सामग्री नहीं हूं बल्कि वो मुझे प्यार करते हैं और मैं जो भी हूं उसका सम्मान करते हैं.”

लेकिन हमारा समाज जिस तरह चर्चित लोगों को तवज्जों देता है लेकिन आम लोगों को नज़रअंदाज़ करता है उससे जोयीता परेशान रहती हैं.

वो कहती हैं, “मीडिया, सरकार और समाज हममें से उनको पहचान और सम्मान देने में समय नहीं लगाता जिन्होंने जीवन में कुछ हासिल कर लिया हो. लेकिन हमारे समुदाय को बाकी लोगों को उनके अपने हाल पर छोड़ दिया जाता है. अपना पेट भरने के लिए उन्हें सिग्नल पर भीख मांगनी पड़ती है. मैं आप सबसे सवाल करती हूं कि क्या हम इस लायक भी नहीं है कि आपके घरों में झाड़ू पोछा कर सकें और अपना पेट पाल सकें?”

“मनाबी दीदी (मनाबी बंदोपध्याय देश की पहली ट्रांस्जेंडर प्रिंसिपल हैं) और मेरे जैसे लोगों को टीवी चैनलों, गेम शो आदि से न्यौते मिलते हैं लेकिन यही चैनल हमारे समुदाय के अनजान चेहरों को स्वीकार नहीं करते. आप बताइये बराबरी कहां हैं? सामाजिक स्वीकार्यता कहां हैं? कहीं नहीं है”

 

 

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...