मेरी कहानी

मेरी कहानी : पैसों की कमी की वजह से दो महीने पहले मैं अपनी बहन खो चुकी हूं लेकिन अब मैं अपने पिता को खोना नहीं चाहती.

तर्कसंगत

September 8, 2017

SHARES

मेरी बहन की डायग्नोसिस हम सबके लिए एक सदमे जैसा था साथ ही पिताजी को दोबारा पैरालिसिस का अटैक होने से हम सब बिल्कुल टूट चुके थे. पैसों की कमी की वजह से मैं अपनी बहन खो चुकी थी और पापा का ईलाज भी रूक गया था”.

यहां क्लिक करके मेरी मदद कीजिए: Ketto.

एकदिन जब मैं स्कूल से आयी तो मुझे बड़ी खुशी हुई ये देखकर की मां मेरी बहन वैभवी के जन्मदिन के लिए बेहद उतावली हो रही थीं. उन्होंने वो सारी चीजें तैयार कर रखी थीं जो वैभवी को पसंद थे, उसके पसंद का खाना भी तैयार था. लेकिन अब वो दिन बस एक यादगार लम्हें बनकर जेहन में रह गये है. ऐसा लगता है जैसे वापस उस लम्हे में जाकर घड़ी रुक जाये और सब वहीं थम जाये. जिंदगी का कुछ भरोसा नहीं शायद तभी किसी ने कहा की बेहतर है आप आगे बढ़ते जायें क्योंकि वक्त का मरहम सारे घावों को भर देता है.

लोग कहते हैं की पैसों से आप खुशियां नहीं खरीद सकते लेकिन हमारे पास अगर पैसे होते तो हमारी जिंदगी खुशहाल होती.

पापा को आज से ठीक 15 साल पहले पैरालिसिस का अटैक हुआ था और पूरे एक साल तक वो बेड रेस्ट पर थे. उस वक्त मेरी मां ने बहुत संघर्ष किया और जैसे तैसे हम तीनों बच्चों के साथ साथ पापा का भी बहुत ख्याल रखा वो भी किसी पारिवारिक आय के बिना. जब पापा ठीक हुये तो वापस हमारी जिंदगी पटरी पर आ रही थी और हमारे पास जितना भी था उसमें हम खुश  थे.

हमारी खुशियों में एक बार फिर ग्रहण लगा जब वैभवी को पारफाइरिया नाम का जेनेटिक डिसऑर्डर डाएग्नॉस किया गया औऱ पापा को फिर से पारालिसिस का अटैक आ गया. मेरी बहन बेइंतेहा दर्द से गुजर रही थी और मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रही थी. ये देखकर मैं बिल्कुल टूट चुकी थी और अंदर ही अंदर रोया करती थी.

मेरी बहन को बचाने का बस एक ही रास्ता था कि उसे वो महंगे इंजेक्शन दिये जायें जो भारत में मिलते भी नहीं थे लेकिन मैं हार मानने वालों में से नहीं थी और अपनी तरफ से बहन को बचाने की पूरी कोशिश कर रही थी.

हमने अपनी तरफ से हर संभव कोशिश की, उन सभी दरवाजों को खटखटाया जहां से कुछ मदद मिलने की उम्मीद थी लेकिन ये देखकर काफी आघात पहुंचा की लोग समय आने पर कैसे आपसे मुंह फेर लेते हैं. जबकि उनके बुरे दौर में हमने दिल खोलकर मदद की है. मेरी मां किसी तरह से अलग अलग जगहों से कर्ज लेकर वैभवी और पापा का ईलाज करवा रहीं थी.

मैं भी बीच में पढ़ाई छोड़कर ललित होटल में काम करने लगी क्योंकि वहीं से मैने इंडस्ट्रीयल ट्रेनिंग ली थी. मेरी तनख्वाह इतनी नहीं थी की घर की जरुरतें औऱ मेडिकल बिल के खर्चे पूरे हो जायें इसलिए हमलोगों को बिल्कुल पेट काट कर गुजारा करना पड़ा.

बीतते समय के साथ चीजें और बिगड़ती चली गयीं. वैभवी को हर दूसरे महीने हॉस्पीटल में भर्ती करवाना पड़ता था जिससे बिल का बोझ बढ़ता जा रहा था साथ ही कर्ज भी ज्यादा हो रहा था. मेरी सबसे छोटी बहन की पढ़ाई भी दांव पर थी क्योंकि हमारे पास उसके फीस भरने के लिए पैसे नहीं थे और न ही हम उसके कॉलेज आने जाने का खर्च उठा सकते थे.

मैं कोशिश कर रही थी की वो कम से कम अपनी पढ़ाई पूरी कर ले. हमने बहुत सारे ट्रस्ट और फाउंडेशन से मदद मांगी. हमने घर भी होम लोन पर ले रखा है और पापा काम नहीं कर पा रहे हैं तो बहुत दिक्कतें आ रही है. लेकिन ऐसे समय में हमारे कज़न दूत समान हैं क्योंकि वो उन लोगों में से एक हैं जो इस संकट की घड़ी में हमारे साथ है.

पापा की कम सैलरी से भी हमारा बस खर्च ही चलता था कोई सेविंग हुई नहीं. वास्तविक स्थिती तो ये है की हम कर्ज के बोझ तले बिल्कुल दब चुके हैं क्योंकि वैभवी के इलाज के लिए बेतरतीब पैसे खर्च हो रहे हैं. पैसों की कमी की वजह से पापा की फिजीयोथेरेपी भी बंद है.

अफसोस की इतनी कोशिश के बाद भी हम वैभवी को नहीं बचा सके और अब उसे गये हुये 2 महीने बीत चुके हैं और आज भी हमलोग उसे हर घड़ी याद करते हैं. मेरी जिंदगी अब भी उसी के इर्द गीर्द घूमती है और मैं बिल्कुल टूट चुकी हूं. काश मैं उसे बचा पाती. वैभवी को खोने हमारे लिए खुद को खोने जैसा है और इस घटना से हम सब की जिंदगी बदल चुकी है.

मुझे आज भी वो मंजर हिला कर रख देता है जब वैभवी दर्द से बेचैन होकर पूरी रात मेरा हाथ पकड़ कर रखती थी. वो कभी कभी इतनी परेशान हो जाती थी की गुस्से में आकर मुझे पीटने लगती थी लेकिन वो भी दिन थे जब मुझे गले से लगाकर प्यार करती थी. मैं ये जानती थी की वो अंदर ही अंदर घुटती थी, उसे बुरा लगता था और वो खुद को लाचार महसूस करती थी क्योंकि वो एक ऐसी पीड़ा को झेल रही थी जिसका हम शायद अनुमान भी नहीं लगा सकते हैं.

मेरे पापा कुछ बोल नहीं सकते लेकिन उनकी आंखें बहुत कुछ बोलती है. एक बार उन्होंने मेरा हाथ पकड़ कर मुझसे हाथ से ईशारा कर के माफी मांगी जो मुझे अंदर तक झकझोर गया. कुछ घाव ऐसे होते हैं जो आपको तोड़ कर रख देते हैं. मेरी कोशिश रहती है की मेरे परिवार खुश रहे इसलिए मैं किसी के सामने नहीं रोती. जब सब सो जाते हैं तो दिल खोलकर रोती हूं. मैं हारा हुआ महसूस करती हूं क्योंकि मैं अपनी बहन को नहीं बचा सकी.

Story By: Poonam Bhagat (via Mission Josh)

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...