मेरी कहानी

मेरा कहानी : मेरी जैसी लड़कियों को शादी करके एक आम जिंदगी बितानी चाहिए. एक्टिंग के करियर में काली लड़कियों के लिए कोई जगह नहीं है.

तर्कसंगत

September 13, 2017

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स्कूल की पढ़ाई खत्म करते ही मैंने जे जे स्कूल में फाइन ऑर्टस में दाखिला लिया. जब मैं पांचवी कक्षा में थी तो एक ड्रॉइंग कंपिटीशन में हिस्सा लेने के लिए मुझे वहां जाने का मौका मिला था. मुझे अच्छे से याद है कि मेरे पिताजी ने उस वक्त मुझसे कहा था कि ये ऐसा कॉलेज हैं जहां एक दिन तुम जरूर दाखिला लेना चाहोगी.

इत्तेफाक से जब मैनें दाखिला लिया तो पहले ही दिन प्रोफसर ने पूछा की आप सभी का लक्ष्य क्या है. सभी की अपनीअपनी ख्वाहिशें थी लेकिन जब मेरी बारी आयी तो मैने जवाब दिया की मैं अपने सरनेम कवि को मशहूर करना चाहती हूं. मेरा इतना कहना था कि पूरी क्लास एक साथ हंस पड़ी.

मैं आवाजें बदलने में माहिर थी इसलिए खाली समय में मैं प्रोफेसर की आवाजों की नकल किया करती थी. जब मैं कोर्स के दूसरे साल में थी तो मेरे एक शिक्षक ने मुझे कॉलेज के कार्यक्रम में मिमिक करने को कहा जो मेरा पहला स्टेज परफारमेंस था. हालांकी शुरूआत में स्टेज पर जाने से मैं डर रही थी.

पढ़ाई के चौथे साल में मैंने सेल्फ पोरट्रेट नाटक में छोटा किरदार निभाया था जिसके लिए इंटर कॉलेजिएट कंपिटिशन में मुझे कई अवार्ड मिले. इसी दौरान निदेशक विजू माने की नज़र मुझ पर पड़ी और उन्होंने मुझे अपने नाटकभीती’ के लिए सेलेक्ट कर लिया. इस प्ले के बाद तो जैसे ईनाम की बौछार हो गयी और मुझे अभिनय के लिए 4 अवार्ड दिये गये वो भी मंझे हुए कालाकारों के बीच लेकिन फिर भी मैनें कभी अभिनय को पेशे के रुप में अपनाने का नहीं सोचा.

कॉलेज से पास आउट होने के बाद मैं एक महिला के लिए काम करने लगी. मैं एक टेबल टॉप में रंग भरने के 200 रूपये फीस लेती थी. मैं इस क्षेत्र में एक नौसिखिया थी इसलीए मुझे खुद मेरे काम का सही मूल्यांकन नहीं था. वहीं बाद में मुझे मालूम पड़ा की मेरे द्वारा पेंट किये गये टॉप को वही महीला एक हजार रुपये में बेचा करती थी. शायद पहली बार तब मुझे शोषण का अहसास हुआ और मैने वो जॉब छोड़ दी.

2004 में मैने अपनी पेंटिंग को ताओ और जहांगीर आर्ट गैलरी में प्रदर्शित किया. एेसे नामचीन आर्ट गैलरी में खुद को साबित करने का जो मौका मुझे मिला वो मेरे लिए सातवें आसमान में चढ़ने जैसा था. लेकिन दुर्भाग्यवश मेरी एक भी पेंटीग बिकी नहीं औऱ मुझे यहां भी निराशा हाथ लगी. मैने यहां भी हार नहीं माना और जेडब्लयू मैरियट के पास के आर्ट गैलरी में फिर से अपनी पेंटीग्स को प्रदर्शित किया.

एक व्यक्ति ने मेरी कलाकृति को खरीदने की इच्छा जताई लेकिन वो मोल भाव करने लगा. उसने मेरे कैनवस, पेंट और फ्रेम का मूल्यांकन कर मुझे एक कीमत बतायी लेकिन मेरी रचना को उसने तरजीह तक नहीं दी. इससे मुझे गहरा आघात पहुंचा. उसी वक्त मैने अपना सारा सामान बांधा और वहां से निकाल गयी. वो मेरे पेंटिंग करियर का आखिरी लम्हा था तभी से मैने पेंटिंग की दुनिया को अलविदा कह दिया.

एक्टिंग करना मुझे अच्छा भी लगता था और कॉलेज में मुझे अभिनय करने के लिए अवार्ड भी मिले था इसलिए इसे मैने अपना करियर दूसरा विकल्प बना लिया. लेकिन ये वाकई में इतना आसान नहीं था और मेरे असली परीक्षा की घड़ी तो अब थी. मुझे अच्छी तरह याद है वो मराठी थियेटर के मशहूर प्रडयूसर से वो आखिरी मुलाकात.

जब मैने उनसे एक्टिंग के मसले पर बात की तो उनका जवाब था ‘मेरी एक्टिंग की राह में तीन ‘K’ मेरे खिलाफ हैं.’ मुझे बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि वो क्या कहना की कोशिश कर रहे थे. उन्होंने फिर मुझे समझाते हुए बताया कि पहली बात तो ये की मेरा सरनेम ‘KAVI’ क्योंकि मैं ब्रह्मण नहीं हूं, दूसरी बात मैं ‘KALWA’ में रहती हूं औऱ तीसरी बात जो मेरे खिलाफ जाती है वो ये है की मैं ‘KALI’ हूं यानि मेरा रंग काला है.

उन्होंने मुझे कहा की मेरी जैसी लड़कियों को शादी करके एक आम जिंदगी बितानी चाहिए. एक्टिंग के करियर में काली लड़कियों के लिए कोई जगह नहीं है. इस बात ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया और मैं पूरे रास्ते रोती रही यही सोच कर की रंगमंच का साथ भी मुझे कभी नहीं मिल सकता है.

मेरी मां भी इन चीजों मे मेरे साथ नहीं थी. उनका कहना था कि जो लड़कियां एक्टिंग में जाती हैं उनकी शादी नहीं हो पाती, उन्हें शराब, सिगरेट पीने का लत लग जाती है और करियर के अंत में वो बिल्कुल निराश और अकेली रह जाती हैं. यहां तक की उन्हें कंधा देने के लिए कोइ हाथ भी नसीब नहीं होता. वो कभी भी मुझे किसी ऑडिशन में या फिर किसी नाटक के मंचन में हिस्सा लेने के लिए पैसे नहीं देती थीं. इसलिए कॉलेज के दिनों से ही मैं पोरर्टेट पेंटिंग के अधिकृत प्रोजेक्ट पर पार्ट टाइम काम करती थी जिससे मेरा खर्च निकल जाता था. शायद ऐसे ही मैं आत्मनिर्भर बन गई.

मैं परिस्थितीयों से निराश जरूर हुई लेकिन कभी भी हार नहीं माना. कहीं न कहीं मैं उन सभी लोगों को गलत साबित करना चाहती थी जो भी मेरे खिलाफ थे इसलिए मैं लगातार लोगों से मिलती रही और अलग-अलग जगह ऑडिशन देती रही.

शुरुआत के दिन मुश्किल भरे थे क्योंकि अगर मुझे सुबह 6 बजे मड आइलैंड पहुंचना होता था तो इसके लिए 4:30 पर ही घर से निकलना होता था. कई बार ऐसा भी हुआ है जब घर वापस आने पर मेरी आखिरी लोकल छूट जाती थी और पूरी रात मुझे स्टेशन पर ही गुजारना होता था. लेकिन शुरूआती दिनों के उस संघर्ष ने मुझे बहुत मजबूत बना दिया.

आज 6 बड़े और प्रोफेशनल प्ले में किरदार निभाना, 10 से भी ज्यादा टीवी शो का हिस्सा होना, कई अवॉर्ड में नोमिनेशन मिलना औऱ कई अवॉर्ड जीतना मेरी उपलब्धियां हैं. मैं गर्व से कह सकती हूं की मैने अपने सपने को साकार किया साथ ही सरनेम को भी मशहूर किया है.

Story By – Humans of Thane

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