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हिंदी में हंसा हिंदी में रोया, हिंदी में सोचा हिंदी में ही लिखा, ये भाषा नहीं जीवन है

Poonam

September 14, 2017

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डॉ. राजेश चौहान, वरिष्ठ पत्रकार

जब दुनिया में आया तो सबसे पहला शब्द हिंदी में सुनाजब बोलना सीखा तो सबसे पहला अक्षर हिंदी में बोला

उसके बाद से हिंदी में हंसा, हिंदी में रोया, हिंदी में सोचा, हिंदी में लिखाहिंदी मेरे अस्तित्व की भाषाहै.

हिंदी के बिना मैं कुछ भी नहीं. हिंदी के बिना मैं ढोर, गंवार और पशु जैसा हूं.

हिंदी ने ही मुझे मनुष्य बनाया औऱ इस राष्ट्र की सबसे छोटी उपयोगी इकाई भी हिंदी ने ही बनाया. पत्रकार के तौर पर मुझे रोजीरोटी भी हिंदी ने ही दी औऱ समाज में पहचान भी हिंदी ने ही प्रदान की.

मुझे संस्कार भी हिंदी ने दिया और मुझे विचार भी हिंदी से ही आया.मैं व्यवहार भी हिंदी से सीखा और सदाचार भी हिंदी से ही पाया.

मैं हिंदी में रहता हूं औऱ मैं हिंदी में जीता हूं. मेरे रोमरोम में हिंदी हैमेरे सांससांस में हिंदी है.

आर्ष औऱ राष्ट्रवादी साहित्य ने मेरे भीतर हिंदी के संस्कार को परिपक्व किया. अटल बिहारी वाजपेयी मेरे लिए हिंदी के आदर्श पुरुष बने. मैं हिंदी का मनीषी बिल्कुल नहीं, लेकिन हिंदी उपासक अवश्य हूं. आज सन्दर्भ के वशीभूत हिंदी पर लिख रहा हूं, वरना मेरे लिए तो नित्यप्रति हिंदी दिवस है. हिंदी से मेरी सुबह होती है और हिंदी के एहसास में ही मैं रात्रि के आगोश में जाता हूं.

यह भी सच है यदि महात्मा गांधी की सोच फलीभूत हो जाती तो दुनिया की 15 प्रतिशत आबादी हिंदी को अपनाती. 1918 में महात्मा गांधी ने हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हिन्दी भाषा को राष्ट्र भाषा बनाने को कहा था.इसे गांधीजी ने जनमानस की भाषा भी कहा था.

14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा ने निर्णय लिया था कि हिन्दी ही भारत की राजभाषा होगी. इस महत्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने और हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर वर्ष 1953 से पूरे भारत में इस दिन हर साल हिन्दीदिवस के रूप में मनाया जाता है.

भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343(1) में दर्शाया गया है कि संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी.

संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय रूप होगा. चूंकि यह निर्णय 14 सितंबर को लिया गया था. इस कारण हिंदी दिवस के लिए इस दिन को श्रेष्ठ माना गया था. लेकिन जब राजभाषा के रूप में इसे चुना गया.

भारत में रहनेवाले जिन लोगों के लिए हिंदी मातृभाषा नहीं है, उन्हें छोड़ दीजिए तो भी हिंदीभाषियों ने फैशनपरस्ती में अपनीमांभाषा का तिरस्कार किया है.

आज वैश्विक पटल पर अंग्रेजी जरूरी है, किन्तु हिंदी की उपेक्षा करके नहीं. मौसी से बहुत लाभ मिल रहा है, इस आधार पर मां को नजरंदाज करना न्यायसंगत नहीं हो सकता.

इस हिंदी का देश की आजादी में सबसे बड़ा योगदान है. इस संसार में जितना भी नूतन ज्ञान उत्पादित हो रहा है, उसके वृहद स्तर पर हिंदी में अनुवाद की आवश्यकता है, ताकि अंग्रेजी पर निर्भरता ज्यादा न बढ़े.

अपनी मातृभाषा के बिना हमारी महान संस्कृति का पराभव हो जाएगा. भारत को इस उत्तरदायित्व को चुनौती के रूप में लेनाचाहिए.बाकायदा इस पर राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता है.

हिंदी के छोटे से सेवक की ओर से अंत में सिर्फ इतना कि– 

आओ हम सब हो जाएं हिंदीहिंदी

बन जाएं दुनिया के माथे की बिंदी 

क्या द्रविड़, क्या अवधि और सिंधी 

मिलजुल गर्व से बोलें हम अपनी हिंदी

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