मेरी कहानी

मेरी कहानीः मैं बहुत मोटी थी और पतला होना चाहती थी लेकिन…

तर्कसंगत

October 7, 2017

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जब मैं बढ़ी हो रही थी तब मेरा वजन औसत से ज़्यादा था. मैं 65 किलो की थी और मेरी दोस्त मुझे एक पहलवान के नाम पर ‘बिग शो’ कहती थीं. मुझे बहुत बुरा लगता था. वजन कम करने के लिए मैं कई बार पागलपन भरे और कई बार ख़तरनाक तरीके अपनाती थी.

मैं बार-बार के तानों से इतनी दुखी और असुरक्षित हो गई थी कि एक बार मैं तीन महीनों तक भूखी रही. इस सबका मेरी सेहत पर बहुत बुरा असर हुआ. चौदह साल की उम्र में ही मैं बार-बार बीमार पड़ने लगी.

मेरे घरवाले मुझे कई डॉक्टरों के पास ले गए. हर बार इलाज अलग होता. लेकिन मैं ठीक नहीं हुई.

जब कैंसर का पता चला

मुझे वो दिन आज भी याद है. मैं और मेरी दादीमां अस्पताल के कमरे में इंतेज़ार कर रहे थे जब मेरे माता-पिता अंदर आए. ऐसा लग रहा था जैसे वो बीमार हों. उनके पीछे मेरे डॉक्टर आए और उन्होंने वो ख़बर सुनाई- तुम्हें कैंसर है लेकिन मैं तुम्हें बचाने के लिए हर संभव कोशिश करूंगा. मैंने उन पर विश्वास कर लिया.

मैंने 6 बार कीमोथैरेपी कराई. मुझे दी गईं दवाइयां इतनी शक्तिशाली थीं कि मैं एक महीने में ही किसी सब्जी जैसी हो गई.

इस सबका मुझपर और मेरे परिवार पर बहुत गहरा असर हुआ. लेकिन एक साल की जद्दोजहद के बाद मैंने ज़िंदगी की जंग जीत ली.

तब मेरे डॉक्टर ने मुझे बताया कि मैं कैंसर के चौथी स्टेज पर थी और मेरे बचने की संभावना लगभग शून्य थी. डॉक्टर ने कहा कि मुझे अब अपने जीवन को पूरा तरह जीना चाहिए.

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मैंने अपने आप को शीशे में देखा. मुझे खाल और हड्डियों के ढांचे में तब्दील एक लड़की दिखी. मैं हमेशा से ऐसे ही पतली तो होना चाहती थी. मुझे लगा कि अगर मैं अब भी अपने आप को प्यार न कर पाऊं तो मैं कितनी बेवकूफ़ होउंगी.

कैंसर चला गया था. लेकिन अब भी कुछ लोग थे जो मेरे गंजे सिर का मज़ाक बनाते थे. अब मेरे भौंहें और पलकें भी नहीं बची थीं. ये मेरे लिए बहुत मुश्किल समय था. मैं विग लगाकर स्कूल जाती थी ताकि बाकी बच्चों से अलग न दिखूं.

मैंने विग उतार दी

समय बीता और मुझे फिर से अहसास हुआ कि मैं अपने आप में बहुत ख़ुश नहीं हूं. मेरे मन में सवाल उठा कि मैं कब तक इस बात को ख़ुद से छुपाती रहूंगी? फिर मुझे अहसास हुआ कि मैं कितनी बेवकूफ़ थी जो मैं पतला होना चाहती थी और उसके लिए कुछ भी करने को तैयार थी. मैं कभी इस बात को लेकर ख़ुश क्यों नहीं थी कि मैं स्वस्थ हूं और ज़िदा हूं?

फिर अगले दिन मैं बिना विग के स्कूल गई और मैंने ख़ुद से वादा किया कि चाहे जो हो मैं हमेशा वही बनी रहूंगी जो मैं हूं और इस बात की परवाह नहीं करूंगी कि लोग क्या सोचते हैं.

कैंसर बहुत बुरा था लेकिन उसने मुझे ख़ुद को प्यार करना सिखा दिया. यही वो बात थी जिसे मैं हमेशा से मिस कर रही थी. और फिर मैंने अपने दिल की सुनी. मैंने वो किया जो मैं करना चाहती थी. फ़ोटोग्राफ़ी सीखी. कई साल बाद कैंसर से अपने संघर्ष पर फोटो सीरीज़ खींची और फिर से अपना सिर मुंढवाया ताकि पूरी सच्चाई दिखा सकूं.

मैंने ये सब सिर्फ़ एक संदेश देने के लिए किया- आपके पास एक ही ज़िंदगी है इसे वो बनने में बर्बाद मत करो जो तुम नहीं हो या दूसरे को ख़ुश करने में अपना समय बर्बाद मत करो.

आप अपनी ज़िंदगी ऐसे जियो जैसे आप जीना चाहते हो. मैं अब हर दिन यही करती हूं. मेरे जिस्म पर बने टैटू या पियर्सिंग बचपन के किसी विरोधी स्वभाव का नतीजा नहीं हैं. अब ये सब किसी न किसी रूप में मुझे ही दर्शाते हैं. मैं हमेशा से ऐसे ही तो दिखना चाहती थी और यही मुझे ख़ुशी देता है. तो फिर किसी और को इससे कोई फ़र्क क्यों पड़ना चाहिए?

-रोशनी कुमार, साभार Humans of Bombay

“I was over weight while growing up — at 65 kgs, my classmates nicknamed me, ‘Big Show’ after a wrestler. I hated it —…

Humans of Bombay 发布于 2017年10月6日

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