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लोकसभा चुनाव में नेहरू को ‘मात’ देने वाले लोहिया की मौत बेहतर इलाज के अभाव में हुई थी

तर्कसंगत

October 12, 2017

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भारत के स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी, प्रखर चिन्तक और समाजवादी नेता की आज पुण्यतिथि है. देश की राजनीति में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान और स्वतंत्रता के बाद ऐसे कई नेता हुए जिन्होंने अपने दम पर शासन का रुख़ बदल दिया और जिनमें एक थे राममनोहर लोहिया. अपनी प्रखर देशभक्ति और तेजस्‍वी समाजवादी विचारों के कारण अपने समर्थकों के साथ ही डॉ. लोहिया ने अपने विरोधियों के मध्‍य भी अपार सम्‍मान हासिल किया.

आज के समय में किसी भी नेता के लिए चार्टड विमान से आना जाना बड़ी बात नहीं, बल्कि मुश्किल घड़ी में तो उन्हें कैसी भी सुविधाएं चुटकी बजाते ही उपलब्ध कराई जा सकती है. लेकिन आपको ये जान कर हैरानी होगी की राम मनोहर लोहिया की जान मात्र 12 हजार रुपए का इंतजाम नहीं हो पाने के कारण बचाई नहीं जा सकी थी.

वो भी डॉ. लोहिया की कठोर ईमानदारी की जिद के कारण ऐसा हुआ. लेकिन उन्होंने अपने दल के नेताओं को साफ कह रखा था कि मेरे ऑपरेशन के लिए चंदा उन राज्यों से नहीं आएगा जहां हमारी पार्टी सरकार में हैं.

तब बंबई में सक्रिय अपने दल सोशलिस्ट पार्टी के एक प्रमुख मजदूर नेता मजदूर नेता से उन्होंने चंदा इकट्ठा करने को कहा था लेकिन समय पर काम नहीं हो सका. ऑपरेशन के लिए लोहिया जर्मनी जाना चाहते थे. वहां जानेआने के खर्च का इंतजाम वहां के एक विश्वविद्यालय ने कर दिया था. वहां लोहिया को भाषण देना था. पर वहां ऑपरेशन कराने का खर्च 12 हजार रुपए था. इस बीच तकलीफ बढ़ जाने के कारण उन्हें नई दिल्ली के वेलिंगटन अस्पताल में भर्ती होना पड़ा था.

30 सितम्बर 1967 को डॉ लोहिया को नई दिल्ली के विलिंग्डन अस्पताल यानी लोहिया अस्पताल में आपरेशन के लिए भर्ती किया गया तब वो सांसद भी थे. वहां लोहिया की पौरूष ग्रंथि का ऑपरेशन हुआ. मगर अस्पताल की बदइंतजामी के कारण 12 अक्तूबर 1967 को उनका निधन हो गया. उन्हें इंफेक्शन हो गया था जिसे संभाला नहीं जा सका. उस अस्पताल का नाम अब डॉ.राम मनोहर लोहिया अस्पताल है.

आज जब मामूली नेता व अफसर भी सरकारी खर्चे पर विदेश में अच्छी से अच्छी चिकित्सा करवा रहे हैं, तब लोकसभा के सदस्य डॉ. लोहिया बेहतर इलाज के बिना कम ही उम्र में चल बसे. जब उनका निधन हुआ, वे साठ साल भी पूरे नहीं कर पाए थे.पर उतनी ही उम्र में वे भारतीय राजनीति व समाज में युगांतरकारी परिवर्तन के नेता बन चुके थे

नेहरू को भी दी थीमात‘- साल 1962 से पूर्व प्रधानमंत्री फुलपुर से चुनाव लड़ रहे थे और उस वक्त लोहिया उनके विरोध में प्रचार कर रहे थे. दरअसल लोहिया यह अच्छी तरह जानते थे कि राजनीति में विरोधी को खत्म करने से पहले जड़ को खत्म करना आवश्यक है. इस चुनाव में कांग्रेस के पास संसाधन अधिक थे, लेकिन फिर भी लोहिया नेहरू के सामने जमकर लड़े. इस चुनाव में नेहरू उनउन क्षेत्रों में पीछे रहे, जहांजहां लोहिया ने चुनावी सभा को संबोधित किया था.

लोहिया की चिन्तनधारा कभी देशकाल की सीमा की बन्दी नहीं रही. इसलिए उन्होंने सदा ही विश्वनागरिकता का सपना देखा था. वे मानवमात्र को किसी देश का नहीं बल्कि विश्व का नागरिक मानते थे. उनकी चाह थी कि एक से दूसरे देश में आने जाने के लिए किसी तरह की भी क़ानूनी रुकावट न हो और सम्पूर्ण पृथ्वी के किसी भी अंश को अपना मानकर कोई भी कहीं आजा सकने के लिए पूरी तरह आज़ाद हो.

आज डॉ लोहिया हमारे बीच नहीं हैं लेकिन डॉ. लोहिया की विरासत और विचारधारा अत्‍यंत प्रखर और प्रभावशाली होने के बावजूद आज के राजनीतिक दौर में देश के जनजीवन पर अपना अपेक्षित प्रभाव क़ायम रखने में नाकाम साबित हुई. क्योंकि उनके अनुयायी उनकी तरह विचार और आचरण के अद्वैत को न ही निभा सके यहां चक की आचरण में भी नहीं ला सके.

PC- itshindi.com

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