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12 साली की दोस्ती से मिला जीवनदान, दोस्त ने लीवर दान कर बचाई महिला की जान

तर्कसंगत

October 22, 2017

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दिल्ली की पूजा भटनागर 17 सालों से लिवर की ख़तरनाक बीमारी से पीड़ित थीं. वो दवाइयों के सहारे ज़िंदा थीं. फ़िर डॉक्टरों ने उन्हें बताया कि दवाइयां काफ़ी नहीं हैं और लिवर ट्रांसप्लांट ही उन्हें बचा सकता है.

पूजा के परिवार या रिश्तेदारों में कोई भी उन्हें अंग दान करने की चिकित्सीय ज़रूरतें पूरी नहीं कर पा रहा था.

पूजा के पति अनुराग भटनागर ने मदद के लिए फ़ेसबुक पर गुहार लगाई. पूजा को उम्मीद नहीं थी कि कोई दोस्त अपना लीवर दान करने के लिए आगे आएगा.

चेन्नाई के प्रसन्ना गोपीनाथ पूजा की जान बचाने के लिए दिल्ली पहुंच गए. क्राउडफंडिग से जुटाए पैसों की मदद से 21 जुलाई दिल्ली के साकेत में स्थित मैक्स अस्पताल में पूजा का ट्रांसप्लांट हुआ.

ट्रांसप्लांट कामयाब रहा. डॉक्टरों ने बताया कि मरीज़ और डोनर दोनों ठीक हैं और सर्जरी के बाद उनकी हालत सुधर रही है.

किसी ग़ैर रिश्तेदार के अंग दान करने के मामलों में ट्रांसप्लांट एक्ट बेहद सख़्त है. इसलिए मैक्स के डॉक्टरों ने ऑपरेशन से पहले हर बात की बारीक़ी से जांच की.

द टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बात करते हुए डॉक्टर सुशांत गुप्ता ने कहा, “अस्पताल प्रशासन ने मरीज़ और डोनर के बीच गहरी दोस्ती का संज्ञान लिया और ट्रांसप्लांट की इजाज़त दे दी.”

पूजा और प्रसन्ना की दोस्ती साल 2005 में शुरू हुई थी. वो ब्रिटेन के वेल्स में उनके पति के साथ एक ही फ्लैट में रहा करते थे.

अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रसन्ना भारत आ गए और चैन्नई में डॉग ट्रेनर का काम शुरू किया. इस दौरान वो हमेशा भटनागर परिवार के संपर्क में रहे. 12 साल बाद ये दोस्ती भटनागर परिवार के लिए जीवनदायक बन गई.

प्रसन्ना ने द लॉजिकल इंडियन से कहा, “पूजा की पोस्ट देखते ही मैंने उनकी मदद करने का फ़ैसला कर लिया. मैंने ये फ़ैसला उसी पल ले लिया था.”

प्रसन्ना के इस क़दम से मैक्स अस्पताल के कर्मचारी भी खासे प्रभावित हुए. जब अंगदान की बात आती है तो करीबी रिश्तेदार भी पीछे हट जाते हैं. ऐसे में एक दोस्त का अपनी दोस्त के लिए अंगदान करने के लिए सामने आने से सब चकित थे.

गोपीनाथ का कहना है कि सर्जरी के बाद अब वो पूरी तरह स्वस्थ हो गए हैं. हालांकि उन्हें अपनी डाइट पर ध्यान देना होता है और वो ज़्यादा एक्सरसाइज़ नहीं करते हैं.

प्रसन्ना गोपीनाथ कहते हैं, “अगले तीन चार महीने तक मुझे अपना ध्यान देना होगा. हालांकि लीवर को फिर बनने में सिर्फ़ 10-15 दिन ही लगते हैं.”

सर्जरी के बाद उन्हें अपने परिवार का भी पूरा साथ मिल रहा है और सब उनका ध्यान रख रहे हैं.

लेकिन पूजा भटनागर की दिक्कतें सिर्फ़ प्रसन्ना गोपीनाथ के सामने आने से ही ख़त्म नहीं हुईं. उनके पास ऑपरेशन पर ख़र्च होने वाले 25 लाख रुपए भी नहीं थे.

ऐसे में पूजा भटनागर का परिवार, रिश्तेदार, दोस्त और छात्र मदद के लिए आगे आए. उन्होंने सर्जरी और पैसों की ज़रूरत के बारे में दूसरे लोगों को भी बताया और कुल 363 लोग मदद के लिए आगे आ गए

क्राउडफंडिग प्लेटफॉर्म इंपैक्ट गुरु के ज़रिए देश विदेश के इन लोगों ने भटनागर परिवार के लिए मदद भेजी.

ऐसे लोग जो पूजा को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते थे, वो भी मदद के लिए सामने आए.

प्रसन्ना गोपीनाथ और उनके परिवार ने पूजा भटनागर की मदद करने का जो साहसिक फ़ैसला लिया हम उसे सलाम करते हैं. अपना अंग दान करना शायद सबसे साहसिक फ़ैसलों में से एक है.

जिन सैंकड़ों लोगों ने पूजा भटनागर को जाने बिना उनकी मदद की और मुश्किल की इस घड़ी में उनके साथ आए हम उन्हें भी सलाम करते हैं.

पूजा भटनागर का मामला एक बार फिर साबित करता है कि दुनिया में इंसानियत और दोस्ती ज़िंदा है.

हम अपने पाठकों को यह बताना भी ज़रूरी समझते हैं कि लीवर दान करना सुरक्षित है क्योंकि लीवर बहुत तेज़ी से फिर से विकसित हो जाता है और दानकर्ता स्वस्थ और लंबा जीवन जी सकते हैं.

सर्जन लीवर का कुछ हिस्सा डोनर के शरीर से लेते हैं और उसे मरीज़ के शरीर में ट्रांसप्लांट कर देते हैं. एक बार नए शरीर में आने के बाद ये अंग स्वयं को विकसित कर लेता है और शरीर के लिए ज़रूरी अपने काम को अंजाम देने लगता है.

लीव को स्वयं को विकसित करने की क्षमता की वजह से ही दानकर्ता के लिए ख़तरा बेहद कम होता है.

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