मेरी कहानी

मेरी कहानीः जब अपनी बेटी का चेहरा देखती हूं तो जीने की हिम्मत मिलती है

Poonam

November 14, 2017

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मेरी बेटी नाजीफ़ा को दो दिनों से तेज़ बुख़ार था. जब मैं काम पर चली जाती हूं तब उसकी देखभाल के लिए कोई नहीं हैं.

इसलिए मैं उसे अपने साथ ले आती हूं और काम की जगह के पास ही ज़मीन पर लिटा देती हूं ताकि काम करते हुए मैं उसे देख पाऊं.

आज वो बहुत बीमार हैं. इसलिए काम को बीच में छोड़कर मैं उसे समय देने की कोशिश कर रही हूं.

मैं काम पर नहीं आना चाहती थी लेकिन अगर मैं काम पर नहीं आऊंगी तो मैं अपनी प्यारी बिटिया का पेट कैसे भरूंगी?

कल पैसों की कमी की वजह से मैं उसे डॉक्टर के पास नहीं ले जा सकी थी. मेरी रोज़ाना की कमाई कुछ भी नहीं है और मालिक सप्ताह के अंत में ही पगार देते हैं.

एक हज़ार ईंटें ढोने के बदले वो सिर्फ़ सौ टका देते हैं. मैं दिन भर पांच सौ ईंटें ही ढो पाती हूं. मैं सुबह पांच बजे काम पर आ जाती हूं. ये काम बहुत कठोर और निर्मम है.

मेरे हाथों, पैरों में बहुत दर्द होता है. पूरा बदन टूट जाता है. रात को नींद भी नहीं आती है. मेरी सुबह पांच बजे उठने की हिम्मत नहीं होती लेकिन जब मैं अपनी बेटी के बारे में सोचती हूं तो उठना पड़ता है.

नजीफ़ा के अब्बा रिक्शा चलाते थे और छह महीने पहले सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई. बीते छह महीने में हमें नहीं पता था कि ज़िंदगी कैसे कटेगी.

मैं दर दर पर भटकती और भीख मांगती. बीते महीने में ढाका आ गई और ईंट भट्टे पर काम शुरू कर दिया. मैं कभी भीख मांगना नहीं चाहती थी. भीख मांगने वालों का कोई सम्मान नहीं होता है.

मैं काम करना चाहती थी लेकिन हमारे गांव में कोई काम ही नहीं था.

मैं अपनी बेटी को अच्छी शिक्षा और बेहतर जीवन देना चाहती हूं. मैं जब उसका चेहरा देखती हूं तो मुझे जीने की हिम्मत मिलती है. मैं उसी के लिए जी रही हूं.

मैं मेहनत करूंगी और अपनी बेटी को पढ़ाऊंगी ताकि उसे कभी दूसरे से भीख नहीं मांगनी पड़े.

तजमीन, 21 साल

The last two days my two-year-old daughter, Najifa has been suffering from a high fever. We have nobody to take care of…

Posted by GMB Akash on Sunday, 12 November 2017

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