मेरी कहानी

मेरी कहानी : हिंदुस्तान ने मेरी जिंदगी बदल दी, ये मेरा आध्यात्मिक घर है.

तर्कसंगत

November 16, 2017

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हिंदुस्तान ने मेरी जिंदगी बदल दी.

2004 में मैं अपनी जिंदगी के बहुत ही बुरे दौर से गुजर रही थी, तब मैने भारत जाने का फैसला किया. इससे पहले मैं कभी भी भारत नहीं गई थी बल्कि किसी लंबी छुट्टी पर भी नहीं गई. मैं भावनात्मक तौर पर थोड़ी नाजुक थी औऱ उम्र को इस पड़ाव में जब आप 45 के हो जाते हैं तो कहीं आराम से एक जगह बसने की तैयारी कर लेते हैं, लेकिन मुझे पता था कि मुझे जाना है.

मै डिप्रेशन से निकलने की कोशिश कर रही थी क्योंकि लगातार मेरी जिंदगी में ऐसी घटनाएं घटी जिनसे निकला बहुत ही मुश्किल था. मेरे मां-बाप मुझे छोड़ कर जा चुके थे और इस दौरान मुझे योग करने से बहुत शांति मिली. मैं सप्ताह में योग की तीन क्लास लिया करती थी और इसी तरह मैं योग ट्रेनर बन गयी.

योग से मेरा लगातार जुड़ाव बढ़ता गया और मेरे अंदर योग के जनक देश यानि भारत को देखने की प्रबल इच्छा होने लगी. ऐसा लगने लगा बस यही अब मेरी जिंदगी का ध्येय बन कर रह गया है. मेरी ये बात थोड़ी तर्कहीन और सहज ज्ञान के परे हो सकती है लेकिन मेरे लिए ये सबसे अच्छी बात है और मुझे इसे कैसे भी पूरा करना था. इसके लिए पहले से योजनापूर्ण तरीके से काम करने की जरुरत थी.

मैने अपने घर की एक तिहाई चीजें बेच दी, बड़े अपार्टमेंट से निकलकर छोटा आशियाना ढूंढ लिया. अपनी प्यारी सी बिल्ली को एक करीबी दोस्त को कुछ दिनों के लिए दे दी और जितना हो सकता था कंजूसी से गुजारा करने लगी ताकि ज्यादा से ज्यादा पैसे बचा सकूं. भारत जाने से पहले मैने अपने सारे काम निपटा लिये और फ्रिलांस जॉब भी छोड़ दी. मैं एक बार सारे काम और जिम्मेदारी को छोड़कर बिल्कुल आजाद रहना चाहती थी.

इंदिरा गांधी एयरपोर्ट पर उतरने से पहले मेरे जेहन में कितने ही सवाल घूम रहे थे. मुझे पता नहीं था भारत में मेरे लिए क्या है, भारत कैसा होगा और 6 महीने तक किन किन परेशानियों और परिस्थितीयों से रुबरु होना पड़ेगा. हिंदुस्तान में लैंड करने के साथ ही मेरा साहसिक सफर शुरु हो गया. हरेक ट्रिप के बाद दूसरे ट्रिप का रास्ता खुद ब खुद बनता चला गया.

जब दिल्ली में सर्दी बढ़ी तो मैं केरल के आयुर्वेदिक रिसॉर्ट में चली गयी जहां मैने समंदर के किनारे शानदार वक्त बिताये. फिर चेन्नई के सबसे अच्छे योग स्कूल में मैं एक महीने के ट्रेनिंग के लिए चली गयी. उसके बाद मैं ताजमहल भी देखने गयी फिर वहां से राजस्थान जहां पर एक पूर्वकालिक राजा के महल में कुछ दिन बिताये.

जब अप्रील में गर्मी बढ़ने लगी तो मैं शानदार पहाड़ियों के बीच धर्मशाला चली गयी. ब्रिटिश रन ऑर्गनाइजेशन के ऑर्ट रिफ्युजी कैंप के साथ जुड़ने के बाद मैंने टिब्बती रिफ्युजी बच्चों को भारत में बसाने के लिए काम किया. उन बच्चों के साथ रहते समय कैसे बीता पता ही नहीं चला.

मैं ट्रिप के आखिरी दौर में ऋषिकेश के एक छोटे आश्रम में गयी. वहां पहुंचते ही रिलेक्स होने के लिए जैसे ही लेटी मेरी आंख लग गयी. जब 30 मिनट के बाद मैं उठी तो बिल्कुल तरोताजा महसूस करने लगी वैसी ताजगी मैने आज तक महसूस नहीं की. तभी मुझे लगा की मैने अपना आध्यात्मिक घर ढूंढ़ लिया. जब 2 जून 2006 को मेरे लंबे सफर की समाप्ति हुई तो मैने पाया की मैं भारत से मैं बेहद प्यार करने लगी हूं और इसे छोड़ना मेरे लिए मुश्किल हो गया है.

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