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क्या हैं यरूशलम को इसराइल की राजधानी का दर्जा देने के मायने?

Poonam

December 6, 2017

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अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने एक ऐतिहासिक फ़ैसला करते हए दुनिया के सबसे विवादित और पवित्र स्थलों में से एक यरूशलम को इसराइल की राजधानी का दर्जा दे दिया है.

यरूशलम को इसराइल की राजधानी के तौर पर मान्यता देने वाले ट्रंप दुनिया के इकलौते नेता हैं.

ट्रंप के इस ऐतिहासिक और विवादित फ़ैसले के बाद समूचे मध्यपूर्व क्षेत्र, ख़ासकर इसराइल और फ़लस्तीनी इलाक़ों में तनाव और संघर्ष बढ़ने का ख़तरा पैदा हो गया है.

ट्रंप के इस फ़ैसले की संयुक्त राष्ट्र, ब्रिटेन, फ्रांस  के अलावा इस्लामी दुनिया के तमाम देशों ने आलोचना की है.

ऐसी क्या वजह है कि ट्रंप के इस फ़ैसले के बाद इसराइलफ़लस्तीन विवाद और मध्यपूर्व के हालात बदल सकते हैं?

दसअसल यरूशलम दुनिया के सबसे पवित्र स्थानों में से एक है. इसकी न सिर्फ़ यहूदी और ईसाई धर्म बल्कि इस्लाम में भी बेहद ख़ास जगह है.

ये शहर हज़ारों सालों से यहूदियों, मुसलमानों और ईसाइयों के दिलों में बसता रहा है.

यहा यहूदी धर्म, इसल्मा और ईसाई धर्म के बेहद पवित्र स्थल हैं. यही नहीं इसराइल और फ़लस्तीन विवाद को ख़त्म करने की जिस दो राष्ट्र अवधारणा की बात की जाती है उसके केंद्र में भी ये शहर ही है.

पूरी दुनिया यरूशल पर इसराइलियों और फ़लस्तीनियों का बराबर हक़ बताती रही थी.

1948 में इसराइल राष्ट्र बनने के बाद से किसी भी देश ने यरूशलम को इसराइल के हिस्से के रूप में मान्यता नहीं दी थी.

1967 के युद्ध में ऐतिहासिक जीत के बाद इसराइल ने पूर्वी यरूशलम के इलाक़ों पर क़ब्ज़ा कर लिया था और तब से ये उसके नियंत्रण में ही है.

लेकिन दुनिया के किसी भी देश ने इसे इसराइल के क्षेत्र के रूप में मान्यता नहीं दी थी.यही वजह है कि तेल अवीव ही इसराइल की अधिकारिक राजधानी है जहां दुनियाभर के दूतावास स्थित हैं.

लेकिन अब यरूशमल को इसराइल की राजधानी के तौर पर मान्यता देकर राष्ट्रपति ट्रंप ने इस समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है.

इसका सीधा असर इसराइल और फ़लस्तीन के बीच शांति समझौते का आधार मानी जाने वाली दो राष्ट्र की अवधारणा पर पड़ेगा.

ट्रंप ने मान लिया है कि यरूशलम इसराइल का ही हिस्सा है.

दुनिया के सबसे ताक़तवर देश के इस अप्रत्याशित क़दम की अंतरराष्ट्रीय जगत में तीखी आलोचना हो रही है.

आलचोना करने वालों में ब्रिटेन और फ्रांस जैसे अमरीका के सहयोगी देश भी शामिल है.

लेकिन अंतरराष्ट्रीय आलोचना का ट्रंप के फ़ैसले पर कोई असर होगा ऐसा लग नहीं है.

इस ताज़ा घटनाक्रम से एक बात स्पष्ट है कि अब मध्यपूर्व के हालात और तनावपूर्ण हो जाएंगे और इसराइल और फ़लस्तीन के बीच हिंसा का एक नया दौर फिर से शुरू हो  सकता है.

जहां तक ताक़त का सवाल है, फ़लस्तीनी इसराइल का मुक़ाबला करने की स्थिति में नहीं हैं.

लेकिन इस घटनाक्रम से फ़लस्तीन में इंतेफ़ादा यानी आत्मप्रेरित हमलों का एक नया दौर शुरू हो सकता है जो किसी भी तरह शांति के लिए ठीक नहीं है.

ट्रंप के फ़ैसले ने इसराइल और फ़लस्तीन के बीच प्रस्तावित शांति समझौते की बुनियाद को हिला दिया है.

यहां से पीछे नहीं जाया जा सकता और आगे भी रास्ता बहुत आसान नहीं दिखता.

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