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मज़दूर अफ़राज़ुल की मौत पर पीएम क्यों ख़ामोश?

तर्कसंगत

December 9, 2017

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राजस्थान के राजसमंद से जारी हुए एक वीडियो ने पूरे देश में सिरहन पैदा कर दी है.

जिसने भी वो वीडियो देखा उसके दिल से आह निकल गई. मनुष्यता अपने सबसे क्रूर रूप में दिखाई दी.

समाज का वो विक्रत रूप सामने आ गया जिसके बारे में सोचकर ही डर लगता है.

एक बेग़ुनाह व्यक्ति को सिर्फ़ उसके धर्म के आधार पर मार दिया गया.

मरने वाले रहम कि गुहार लगाता रहा, मारने वाला अपनी विचारधारा के मद में डूबा ताबड़तोड़ हमले करता रहा.

जब वीडियो ख़त्म हुआ तो सिर्फ़ एक इंसान ही नहीं जला बल्कि मानवता भी जल गई, भारत की गंगा जमनी तहज़ीब का धागा भी राख हो गया.

नींद उड़ा देने वाली ये घटना सोचने पर मजबूर करती है कि हम कहां आ गए हैं.

शंभूलाल ने अफ़राज़ुल के साथ जो किया क्या ये अनायास हुआ है या इसकी रूपरेखा पहले ही लिखी जा चुकी है?

इस सवाल का जवाब जांच एजेंसियों को तलाशना होगा लेकिन एक और अहम सवाल उठ रहा है प्रधानमंत्री की ख़ामोशी पर.

हर बात पर बोलने वाले, ट्वीट करने वाले, छोटेछोटे कामों का श्रेय लेने वाले हमारे प्रधानमंत्री इतनी बड़ी घटना पर ख़ामोश हैं.

देश की एकता का धागा टूट रहा है. लोगों का एक दूसरे से विश्वास उठ रहा है. देश की बड़ी अल्पसंख्यक आबादी की सुरक्षा का सवाल खड़ा हो गया है.

एकता को बरक़रार रखने की, विश्वास कायम करने की सुरक्षा का भरोसा देने की ज़रूरत है.

ये काम प्रधानमंत्री ही कर सकते हैं. देश की एक बड़ी आबादी उनका अनुसरण करती है. उनकी हार बात सुनी जाती है.

इस मुश्किल वक़्त में ये उम्मीद की जाती है को वो कुछ बोलें, घटना की ज़िम्मेदारी लें और सुनिश्चित करें कि सरकार और प्रशासन अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है, मुस्तैद है.

यदि प्रधानमंत्री ने मौका छोड़ा तो देश अविश्वास और असुरक्षा के ऐसे अंधकार में डूबेगा कि रोशनी दिखाई नहीं देगी.

ये प्रधानमंत्री मोदी के बोलने का वक़्त है. प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी को देश के मुसलमानों की सुरक्षा का भरोसा देना ही होगा.

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