मेरी कहानी

मेरी कहानीः मैं लड़कों जैसा नहीं था, मुझे घर से निकाल दिया गया, 16 बरस की उम्र में मैं बेघर हो गया

Poonam

December 27, 2017

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मेरी स्कूल में एक डांस कंपटीशन था और मैंने मुख्य महिला किरदार निभाना तय किया. जब मैं घर आया तो मेरे पिता ने मुझे सज़ा दी. उन्हें लगा कि मैंने समाज में उनका नाम ख़राब कर दिया है. उन्होंने मुझे उल्टा लटका दिया और बुरी तरह पीटा. उस समय में सिर्फ़ आठ या नौ साल का था.  क्योंकि मैं लड़कियों की तरह व्यवहार करता था इसलिए लोग इस पर टिप्पणियां करते थे जो मेरे पिता के कानों में पहुंच जाती थी. मैं परिवार का सबसे बड़ा बेटा था और मेरा नाम बड़े गर्व के साथ रखा गया था. लेकिन मैं जैसे-जैसे बड़ा हो रहा था अपनी लैंगिक पहचान से दूर होता जा रहा था. मैं जब भी अपने अंगों को देखता तो मुझे लगता कि मेरे साथ कुछ न कुछ ग़लत है.

मैंने अपना अधिकतर बचपन और लड़कपन असमंजस में बिताया है. त्यौहारों और पारिवारिक कार्यक्रमों से मुझे दूर ही रखा जाता. मैं अपने आपको अकेला अपने कमरे में पाता. मेरा लड़कियों जैसा दिखना मेरे परिवार के लिए शर्म की वजह बन गया था.

भले ही मैं पढ़ने में अच्छा था लेकिन बावजूद इसके मुझे स्कूल में भी दिक्कतों का ही सामना था. मुझे याद है किस तरह मेरे एक टीचर को मेरे बैग से लिपस्टिक और मैकअप का सामान मिल गया था. मुझे स्कूल की मोर्निंग असेंबली के सामने शर्मिंदा किया गया और अंततः स्कूल से ही निकाल दिया गया.

अकेलापन ही मेरा जीवन बन गया. मैंने ऐसे लोगों से जुड़ना शुरू कर दिया जो मेरे जैसे ही थे या परेशान थे. और फिर मुझे परेशान लोगों और ड्रग्स के बीच साथ मिला. मैं अपनी लैंगिक पहचान को लेकर परेशान था. ड्रग्स ने मुझे इससे शांति दी.

मैं अभी भी एक लड़का ही था जो लड़कियों जैसे महसूस करता था और जो नहीं जानता था कि क्या करे. मेरे पास कोई ऐसा व्यक्ति भी नहीं था जिससे मैं अपने इस असमंजस को लेकर बात कर सकूं. मैं जीवन के प्रति लापरवाह होता चला गया.

ड्रग्स मेरे लिए शांति का एकमात्र ठिकाना बन गए. मैं ड्रग्स का आदी हो गया और अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए मैं इसका लेनदेन भी करना लगे. मैं एक हज़ार रुपए लेकर जोगबानी के लिए बस पकड़ता था. मैं इससे तीन गुणा पैसा बना लेता था और मेरे पास अपने लिए भी ड्रग्स होती थीं.

मैं ड्रग्स ले रहा था, इसे लेकर मेरा परिवार बहुत ज़्यादा परेशान नहीं था. लेकिन वो मेरे लड़कियों जैसा महसूस करने को लेकर बहुत परेशान थे.  मुझे रिहेब में भेजा गया. लेकिन ऐसा ड्रग्स की लत छुड़वाने के लिए नहीं किया गया बल्कि मेरा परिवार मेरा व्यवहार बदलना चाहता था.

मैं जब रिहेब केंद्र से लौटा और मेरे अंदर कोई बदलाव नहीं आया तो मेरे परिवार ने मुझे घर से निकाल दिया. मैं उस समय सिर्फ़ सौलह साल का था. मैं उस कच्ची उम्र में बेघर हो गया.

मैं काठमांडू आ गया और ट्रांसजेंडर समुदाय के कुछ लोगों ने मेरा साथ दिया. लेकिन मेरी ड्रग्स की लत इतनी ख़राब हो चुकी थी कि उन्होंने भी मुझे घर से निकाल दिया. मैं एक बार फिर से बेघर हो गया. लेकिन मुझे अब भी ड्रग्स की ज़रूरत थी.

मैंने पैसों के बदले सेक्स करना शुरू कर दिया. ये मेरी लत को बरक़रार रखने के लिए आसानी से मिलने वाला पैसा था. मैं अपनी लैंगिक पहचान को लेकर पहले से ही संघर्ष कर रहा था. अब मेरे ऊपर ड्रग्स, सेक्स का भी बोझ था.

ड्र्ग्स ने मुझे शारीरिक तौर पर इतना कमज़ोर कर दिया था कि मैं कुछ करने लायक ही नहीं बचा था.  मैं बसंतपुर में पागलों की तरह नंगे पैर ही भटका रहता था. मानों मैं रसातल में चला गया था. मैं बहुत ख़ुशनसीब था कि एक रिहेब केंद्र ने मुझे स्वीकार कर लिया और पूरी तरह बर्बाद होने से बचा लिया.  वहां मुझे सोचने का मौका मिला. ड्रग्स का प्रभाव धीरे-धीरे कम हो रहा था और अब मैं चीज़ों को देख पा रहा था. मुझे समझ आ गया था कि मेरे डर ने कैसे मुझे जकड़ लिया था. बुरी तरह फंसा लिया था.  लोग क्या कहेंगे, मेरे बारे में क्या सोचेंगे, इसी बात का डर मुझे एक झूठी दुनिया में ले आया था. मैं जो नहीं था वो बनकर जी रहा था.

अंततः मेरे भीतर हिम्मत आ गई और मैंने अपनी लैंगिक पहचान को पूरी तरह स्वीकार कर लिया. मैं उन लोगों के लिए आवाज़ उठाने लगा जिन्हें मेरी तरह ही अपनी लैंगिक पहचान की वजह से दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था. अपनी लैंगिक पहचान को स्वीकार करने का मेरा फ़ैसला ही मुझे दोबारा ज़िंदगी के करीब ले आया. ये एक नए जीवन की शुरुआत जैसा था.

मुझे बहुत अच्छी तरह याद है. वो फ़रवरी 2011 का एक दिन था जब मैंने हाई वेस्ट स्कर्ट, टी शर्ट और हाई हील्स पहनीं थी और मैंने गर्व के साथ एक ट्रांसजेंडर महिला के तौर पर अपने पहल क़दम रखे थे. औरा ऐसा करके मुझे पहली बार आज़ादी का अहसास हुआ था.

रीना लींबू, काठमंडू Via- Stories of Nepal

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