मेरी कहानी

मेरी कहानी- मैं कभी भी घर से बाहर अकेली नहीं गयी जो मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल साबित हुई

तर्कसंगत

January 15, 2018

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मैं अपनी मां और बड़ी दीदी के साथ पली बढ़ी हूं क्योंकि मैं जब बहुत छोटी थी तो मेरे पिता चल बसे थे. मेरी मां ही हमारे पढ़ाई से लेकर हर चीज का ख्याल रखती थीं. एक पिता की अहमीयत क्या होती है शायद इस बात को मुझसे बेहतर कोई नहीं समझ सकता. मुझे लगता है की पिता की जगह कोई नहीं ले सकता है क्योंकि जिस तरीके से एक बाप अपनी बेटी का ख्याल रखता है उस तरह कोई भी नहीं रख सकता. अपनी जिंदगी से जुझते 20 साल की उम्र में मेरी शादी हो गई और अब मेरा भी परिवार हो गया था.

शुरुआत में घर के खर्च में मदद करने के लिए मैं काम करना चाहती थी. मैं बस हर तरीके से अपने छोटे और खुबसुरत परिवार का ख्याल रखना चाहती थी. लेकिन बस एक साल की खुशहाली के बाद फिर से खुशियों ने मुझसे मुंह फेर लिया. एक दिन मेरे पति ने मुझसे कहा की उनकी तबीयत खराब हो रही है और उनके दोनों पैर में सूजन हो गयी है. वो कुछ भी खाने से डर रहे थे क्योंकि बार-बार उन्हें उल्टी आ रही थी. हमारा शादी के बाद दिल्ली आने का निर्णय सही नहीं था क्योंकि यहां मेरे लिए सभी नए थे और मैने अभी तक किसी से दोस्ती भी नहीं की. मैं पति के बगैर आज तक घर के बाहर नहीं निकली जो मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल साबित हुई क्योंकि मुझे अकेले ही अपने पति को अस्पताल लेकर जाना पड़ा.

मेरी पति बहुत ही गंभीर हालत में थे और जैसे ही उन्हें लेकर मैं अस्पताल पहूंची, डॉक्टर सीधे उन्हें आईसीयू में लेकर चले गये. चेकअप के बाद पता चला की उनकी दोनो किडनी खराब हो गयी थी. मेरे पति सिगरेट से दूर रहते हैं और उन्होंने कभी शराब भी नहीं पी लेकिन फिर भी क्यों पता नहीं उनके साथ ऐसा क्यों हुआ. डॉक्टर ने हमे किडनी बदलने की सलाह दी और तीन सप्ताह तक डायलिसिस पर रखने की बात कही. लेकिन कोई डोनर नहीं मिलने से लगातार उनकी तबीयत बिगड़ने लगी. लेकिन एक दिन हमारे एक रिश्तेदार ने एक किडनी देने को राजी हो गये और सफलतापूर्वक उनकी किडनी बदल गयी. लेकिन कुछ महीनों बाद वो भी किडनी खराब हो गयी और उन्हें फिर से डायलिसिस पर रखना पड़ा. उनके इलाज में हमारी सारी जमापूंजी खत्म हो गयी. घर में कमाने वाले शख्स मेरे पति ही थे जिस कारन हमारी स्तिथि और खराब हो गयी.

तब मैंने जॉब करने का फैसला लिया और एक बड़े बैंक में मेरी नौकरी लग गयी. ये समय मेरे लिए बहुत ही मुश्किल था क्योंकि नौकरी करने के साथ-साथ मुझे हॉस्पीटल भी जाना पड़ता था और मेरी एक साल की बेटी का भी मुझे ख्याल रखना पड़ता था. काम पर जाने से पहले मैं अपनी बेटी को बहन के घर छोड़कर जाती थी और मुझे जाता देखकर वो बहुत रोती थी. लेकिन जैसे-तैसे मैं इन बाधाओॆ से लड़ती रही तभी मेरे देवर ने अपना एक किडनी मेरे पति को डोनेट कर दिया. सभी टेस्ट सफल रहे और उनके किडनी बदलने की प्रक्रिया सफलतापूर्वक संपन्न हुई. मैने क्लर्क के तौर पर नौकरी ज्वाइन की थी लेकिन कड़ी मेहनत के कारन मैं आज मैनेजर बन गई हूं. मैने इसी बीच ड्राइविंग भी सीख ली ताकि उन्हें हास्पीटल ले जाने ंमें कोई परेशानी न हो. कई बार तो ऐसा होता था की काम खत्म करते ही मुझे भागना पड़ता था, उन्हें हास्पीटल ले जाने के लिए. इस घटना को अब 13 साल हो गए हैं. मेरी बेटी 16 साल की हो गयी है और मेरे पति भी स्वस्थ हैं और वो भी काम पर जाते हैं.

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