मेरी कहानी

मेरी कहानीः कैंसर के बाद जब मैं अकेली हो गई तब उसने ये कविता भेजी

तर्कसंगत

January 25, 2018

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मैं गौरी कपूर हूं और मैं हरयाणा के सोनीपत की रहने वाली हूं, साल 2016 में मुझे ब्रैन कैंसर होने के बारे में पता चला था. अब ये मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण वक़्त है क्योंकि मुझे बहुत पीड़ा सहनी पड़ती है.

इस मुश्किल दौर में मेरी सबसे अच्छी दोस्त सुप्रिया सिंह ने ही मेरी सबसे ज़्यादा मदद की है. सुप्रिया कोलकाता में रहती है और वो 21 साल की है. हम दोनों की मुलाक़ात इंटरनेट पर हुई है.

इस मुश्किल वक्‍त में उसने मेरा बहुत साथ दिया है. उसने जो मेरे लिया किया है शायद मैं कभी उसका बदला न चुका पाऊं. लेकिन मैं वो कुछ कविताएं शेयर करना चाहती हूं जो उसने मेरे लिए लिखी हैं.

वो एक बहुत अच्छी लेखिका है और उसकी कविताएं मुझे कैंसर से लड़ने में मदद करती हैं.

आप अपने बेशक़ीमती वक़्त में से कुछ पल निकालिए और उसकी ये बहुमूल्य कविताएं पढ़िए. मैं सभी लोगों से ये अपील करती हूं कि वो इस बात को समझें कि कैंसर का मरीज बोझ नहीं होता है.

बाकी लोगों की तरह हमें भी आपके प्यार और सेवा की ज़रूरत है.

पढ़िए सुप्रिया की लिखी कविताएं

मैं तुम्हारी तस्वीर देखती हूं और गर्व से मुस्कुराती हूं.

मैं कहती हूं कि ज़रा उसे देखो तो सही

वो इतनी ख़ूबसूरत कैसे हो सकती है

उसके बाल कितने रेशमी हैं और आंखों में कितनी चमक है.

उसके गुलाबी होठ घुमावदार हो जाते हैं जब वो मुस्कुराती है

उस वक़्त तुम ज़रूर ख़ुश रही होंगी

तुम कितनी जवान लगती हो, जोशीली

जैसे कोई झरना अपने शैशवकाल में हो

तुम हर चीज़ में सबसे बेहतर कैसे हो सकती हो?

जब बैठती हो तो कितनी शालीन लगती हो

किस तरह तुम अपना सर हमेशा ऊंचा रखती हो

तुम उस समय कितनी अलग थीं

इस दुनिया की कोई परवाह तुम्हें नहीं थी

तुम तो किसी आशिक के दिल की चमक सी थीं

और तुम वो धुनें बजातीं जो मेरे दिल के सबसे नज़दीक़ थीं

मैं दुखी होकर ये बात कह रही हूं

कहां चला गया तुम्हारा वो वैभव?

वो सब क्यों सिमटकर बस तुम्हारी मुस्कान में रह गया है?

आह, वो मुस्कुराहत जिसमें छिपा है कितना दर्द

इसलिए मैं तुम्हारा वो जोश मिस करती हूं

वो गर्व से अभिभूत तुम्हारे शब्द

लेकिन ये भी अजीब है कि तुम पूरी की पूरी मेरे पास हो

अपने सभी दर्दों सभी आनंदों के साथ

हंसने और रोने के अपने कारणों के साथ. कैंसर की अपनी कहानियों के साथ.

मैं हूं तुम्हारी आवाज़ की उस कर्कश ध्वनि पर ग़ौर करने के लिए

तुम्हारे सर में हो रहे दर्द को महसूस करने के लिए

मैं चाहती हूं कि लोग भी मेरी तरह तुम्हें देख पाते

तुम अपने सर की वो कैंसर पीड़ित कोशिका नहीं हो

न ही वो ख़ून जो तुम्हारे मुंह से निकलता है

ना ही वो बारबार डॉक्टर के पास जाने वाली लड़की

और न ही शरीर का लगातार कम होता वज़न

तुम वो लड़की हो जो दिल खोलकर नाचती थी

जो अपनी मस्त आवाज़ में गाती थी

जो सामाजिक मुद्दों के लिए लड़ती थी

जो पार्क में उन घूरती निगाहों का बहादुरी से सामना करती थी

तुम अब भी अपना सिर गर्व से ऊंचा कर सकती हो

क्योंकि वो ऊंचा ही अच्छा लगता है

तुम अब भी उस दुनिया को जीत सकती हो

जिसे लगता है कि तुम हार गई हो

(सुप्रिया ने ये कविता अंग्रेज़ी में लिखी थी, यहां हमने हिंदी अनुवाद प्रकाशित किया है.)

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