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चेतावनीः जो मुर्गा आप खा रहे हैं उसमें है दुनिया का सबसे ताक़तवर एंटिबॉयोटिक

तर्कसंगत

February 2, 2018

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द ब्यूरौ ऑफ़ इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मुर्गों पर दुनिया का सबसे ताक़तवर एंटिबॉयोटिक कोलिस्टिन इस्तेमाल किया जा रहा है.

दुनियाभर में डॉक्टर इस एंटीबॉयोटिक को उन मरीज़ों पर इस्तेमाल करते हैं जिन पर बाक़ी सभी एंटीबॉयोटिक बेअसर हो जाते हैं.

भारतीय मुर्गा फार्मों में इस एंटीबॉयोटिक का इस्तेमाल मुर्गों को रोगों से बचाने या उनका वज़न बढ़ाने के लिए किया जा रहा है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कोलिस्टिन को मानवों पर इस्तेमाल की जाने वाले दवाइयों के लिए बेहद अहम बताया है और जानवरों पर इसका उपयोग वर्जित है.

 

जानवरों का वज़न बढ़ाने के लिए इसके प्रयोग पर भी रोक है.

भारत में कोलिस्टिन का उत्पाद दो कंपनियां करती हैं. लेकिन भारत में हर साल डेढ़ सौ टन से अधिक कोलिस्टिन का आयात किया जाता है.

ब्यूरौ ऑफ़ इंवेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म के मुताबिक साल 2016 में जानवरों पर इस्तेमाल के लिए भारत, वियतनाम, दक्षिण कोरिया, रूस, नेपाल, ग्वाटेमाला, कोलंबिया, बोलीविया, मैक्सिको और अल सालवाडोर में 2800 टन कोलिस्टिन आयात किया गया.

भारत में मुर्गा उद्योग में इस ड्रग का बेतहाशा इस्तेमाल किया जा रहा है. उन मुर्गों को भी कोलिस्टिन दिया जा रहा है जिन्हें इसकी ज़रूरत ही नहीं है.

इस ड्रग के बेतहाशा इस्तेमाल का नतीजा ये होगा कि बैक्टीरिया पर इसका असर कम हो जाएगा.

 

स्वास्थ्य समुदाय की ओर से चेतावनी दिए जाने के बावजूद भारत में कम से कम पांच कंपनियां खुले तौर पर कोलिस्टिन वाले उत्पादों का प्रचार वज़न बढ़ाने के लिए कर रही हैं.

इनमें से एक कंपनी वेंकीज़ भारत में पॉल्ट्री उत्पादों की शीर्ष कंपनियों में भी शामिल है.

पशुओं की दवाई बेचने के अलावा ये कंपनी अपने चिकन उत्पाद बनाती है. इसके अलावा केएफ़सी, मैकडोनल्ड, पिज़्ज़ा हट और डोमिनोज़ जैसी बड़ी कंपनियों को मुर्गा सप्लाई करती है.

 

वेंकीज़ किसानों को भी कोलिस्टिन बेचती है. जो मुर्गा हम बाज़ार में खाते है उसे ये एंटीबॉयोटिक दिया जाता है.

इस ड्रग के अधिक इस्तेमाल का नतीजा ये हो सकता है कि बैक्टीरिया इसके प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेंगे. अंततः बैक्टीरिया सुपरबग बन जाएगा यानी ऐसा वायरस जिसका इलाज नहीं होगा.

संयुक्त राष्ट्र के सलाहकार प्रोफ़ेसर टिमोथी वॉल्श के मुताबिक कोलिस्टिन वायरस के ख़िलाफ़ अंतिम रक्षा कवच है. ये दवा उन मरीज़ों पर इस्तेमाल की जाती है जिन पर बाकी सभी एंटी बॉयोटिक बेअसर हो जाते हैं.

प्रोफ़ेसर वॉल्श के मुताबिक इसे मुर्गो को खिलाना पागलपन है.

वो कहते हैं, “कोलिस्टिन के प्रति प्रतिरोधक क्षमता वाला वायरस मुर्गे के फ़ार्मों और उसके इर्द गिर्द के वातावरण में फैल जाएगा, मीट को दूषित कर देगा, फार्म पर काम करने वाले कर्मचारियों के ज़रिए ये बड़ी आबादी तक भी फैल सकता है.”

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सुपरबग को सबसे बड़ा स्वास्थ्य ख़तरा बताया है. यदि एंटीबॉयोटिक बेअसर हो गए तो डॉक्टरों को पास इंफ़ेक्शनों से निबटने के लिए कोई दवाई नहीं होगी. इसका नतीजा ये होगा कि सामान्य वायरस भी जानलेवा हो जाएंगें.

सुपरबग की वजह से सालाना सात लाख मौतें हो रही हैं और यदि यही दर चलती रही तो साल 2050 तक सालाना एक करोड़ लोग सुपरबग की वजह से मरने लगेंगे.

भारत में मुर्दा उद्योग तेज़ी से बढ़ रहा है. साल 2003 से 2013 के बीच भारत में मुर्गा उत्पादन दोगुना हो गया था.  अधिकतर मुर्गा इस समय ओद्योगिक स्तर पर चल रहे मुर्गा फ़ार्मों में उत्पादित होता है.

साल 2014 में किए गए एक शोध से पता चला था कि भारतीय मुर्गों में छह प्रकार के एंटीबॉयोटिक होते हैं. जिसका स्पष्ट मतलब ये है कि भारतीय मुर्गा फ़ार्मों में एंटीबॉयोटिक का इस्तेमाल खुल्लम खुल्ला किया जा रहा है.

भारत में मुर्गे की बढ़ती मांग की एक वजह धार्मिक भी है. बीफ़ या पोर्क की तरह मुर्गों को लेकर कोई धार्मिक पूर्वाग्रह नहीं है. इसे हिंदू और मुसलमान बराबर खाते हैं और इस पर किसी तरह का कोई प्रतिबंध भी नहीं है.

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