मेरी कहानी

एक चायवाले का सफरनामा- इसरो में काम करने से लेकर IIM-A तक चाय बेचने की कहानी

तर्कसंगत

February 9, 2018

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सन् 1962 में उत्तर प्रदेश से निकल कर मैं इस शहर में अपने पिताजी के साथ आया था और यहीं पर मैने अपनी पढ़ाई की. स्कूल की पढ़ाई खत्म करने के बाद मैने टेक्निकल डिपलोमा कोर्स ज्वाइन किया लेकिन परिवार में कुछ दिक्कतें आ गई जिसकी वजह से मैं ये कोर्स पूरा नहीं कर पाया. कुछ साल बाद मैने इसरो में बतौर इलेक्ट्रीशियन काम किया. कुछ साल काम करने के बाद मैने ये नौकरी छोड़ दी. बहुत समय से मैं ये विचार कर रहा था कि अपना कुछ करूं लेकिन कुछ ढंग का काम समझ नहीं आया. एक दिन जब मैं अपने किसी रिश्तेदार के लिए बिड़ी लेने के लिए आईआईएम के बाहर आया तो मैने देखा कि वहां तो आसपास जंगल जैसा क्षेत्र है जहां पक्की सड़क भी नहीं है. वहां एक पान की दुकान थी और एक बूढ़ा व्यक्ति कुछ स्नेक्स बेचने का काम कर रहा था लेकिन छात्रों के लिए कोई चाय की दुकान नहीं थी. तभी मैने निश्चय कर लिया की यहां पर एक चाय का स्टाल खोलुंगा. मुझे इस जगह और इस शहर में चाय, ऑमलेट, बन, सिगरेट इत्यादी बेचते 5 दशक बीत चुके हैं. आईआईएम अहमदाबाद के छात्रों ने मेरे बिजनेस मॉडल पर एक केस पेपर भी तैयार किया है और मैं वहां के क्सासरूम में प्रोफेसर की कुर्सी पर बैठकर प्रेजेंटेशन भी दे चुका हूं. जब आईआईएम अहमदाबाद में कैंपस के चारों ओर बड़ी दीवारें बनायी जा रही थी तब मेरे लिए उन्होंने दीवार में एक खिड़की बना दी ताकि मैं अपना काम लगातार कर सकूं. इसरो में काम करने से लेकर देश की बेहतरीन विश्वविधालय के छात्रों को चाय बेचने तक का सफर बहुत ही खूबसूरत और सुखदायी रहा है.

लेकिन मेरी जिंदगी का दुखद पहलु ये है की वो छात्र जो मेरे ग्राहक थे, उनमें कुछ नेता बन गये, कुछ प्रोफेसर, कुछ सिईओ लेकिन मेरी कोई तरक्की नहीं हुई. मैं आज भी एक चायवाला हूं.

– रामभाई कोरी (आईआईएम टी स्टाल)

Story By – Pray Bavishi | Humans Of Amdavad

 

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