मेरी कहानी

मेरी कहानी: वो छोटी बच्ची जो पढ़ने के लिए मेरे सामने रोयी आज वो इंजीनियर है

तर्कसंगत

February 14, 2018

SHARES

मुझे पापा के साथ वीकेंड मनाना बहुत अच्छा लगता था. वो हमेशा ही मेरे साथ होते थे. हम दोनों का लगाव बहुत गहरा था लेकिन उनके जाने के बाद से मेरी जिंदगी ही बदल गयी. वो अचानक ही हमे छोड़ कर चले गये, क्योंकि उन्हें कैंसर था, जिसका पते हमे तब लगा जब बहुत देर हो चुकी थी. वो बहुत ही कष्टदायी दर्द से गुजर रहे थे, लेकिन अलविदा कहने से पहले उन्होंने अपनी सारी संपत्ति मेरे नाम कर दी और किसी अच्छे काम में उनका इस्तेमाल करने को कहा.

मैं सियोन के एक स्कूल में काम करती थी जहां मैं कई सालों से कार्यरत थी और पिता के गुजरने के कुछ सप्ताह बाद मैं फिर से अपने काम में लग गयी. लेकिन कैंसर के मरीजों के लिए मेरे दिमाग में ख्याल आते ही मुझे बेचैनी होने लगती. कुछ महीनों के बाद मेरी मुलाकात एक डॉक्टर से हुई जिन्होंने मुझे बताया की पुणे के एक अस्पताल में कुछ अनाथ बच्चे कैंसर से पीड़ित हैं जिन्हें सही उपचार नहीं मिल रहा है. शायद यही मेरा वक्त था और तबसे मैं उन 28 बच्चों के लिए गीता मां बन गयी.

जब उन बच्चों से पहली बार मुलाकात हुई तो उनमें से कई तो कुछ ही दिनों तक खुद को जीवित मान रहे थे लेकिन अब पूरे एक दशक का वक्त बीत चुका है और ज्यादातर बच्चे अभी तक जीवित हैं, स्वस्थ हैं और खुश भी. मेरे पास कई वोलंटीयर्स हैं जो मेरे बच्चों को पढ़ा रहे हैं और कई लोग दिल खोलकर पैसों से भी मदद दे रहे हैं. मैं बच्चों से हर दिन नहीं मिल सकती क्योंकि उन्हें इन्फेक्शन का खतरा है. इसलिए रविवार को जब मैं उनसे मिलने जाती हूं तो खुद का बनाया खाना लेकर जाती हूं और सभी को अपने हाथों से खिलाती हूं.

मैं स्ट्रीट किड्स को पढ़ाने और उनके माता-पिता को सलाह भी देती हूं. इस दुनिया में बहुत ऐसे दिलदार लोग हैं जो इन बच्चों के लिए दिल खोलकर मदद देते हैं, मैं उन सभी लोगों का शुक्रगुजार हूं और साथ ही अपने मां-बाप की एहसानमंद हूं जिन्होंने मुझे इस लायक बनाया. मेरी कोशिश होती है कि मैं हर बच्चे के केमो सेशन में मौजूद रहूं ताकि वो अकेला न महसूस करें. वैसे भी उन्हें जितना प्यार दिया जाये वो भी कम है.

मेरे लिए जो सबसे अच्छी बात है वो इन बच्चों के लिए खाना बनाना, और उनके लिये कि गयी एक छोटी सी कोशिश भी उन्हें हर्षोल्लास से भर देता है. जब भी मैं उनके चेहरे पर खुशी देखती हूं मेरा दिल गदगद हो जाता है और जैसे ही मुझे कोई गीतू मां कहता है, किसी भी मां की तरह मेरा दिल भी पिघल जाता है.

कुछ दिनों पहले मैं एक छोटी बच्ची से मिली जो पढ़ना चाहती थी लेकिन उसके माता-पिता पैसों की कमी की वजह से पढ़ाने में सक्षम नहीं थे, इसलिए वो बच्ची किसी के घर मेड का काम करती थी. वो मुझसे मिल कर रोने लगी तब मैने उसके माता-पिता से बात की. काफी देर बात करने पर उसके माता-पिता एक शर्त पर पढ़ाने को राजी हुये की उसे पढ़ाने की जिम्मेदारी मेरी होगी. मैने अपने पति से बात की और हमेशा की तरह उन्होंने मुझे सपोर्ट किया. मुझे खुशी है की आज वो इंजीनियर बन गयी है. उन बच्चों में आये बदलाव को देखकर मुझे खुशी होती है. मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रही हूं और मेरे पिता की मदद से मैने भी उन बच्चों के लिए थोड़ा बहुत किया है. मुझे अपने पिता की कमी आज भी महसूस होती है खासकर जब मुझे अब्दुल कलाम अवार्ड मिला तो मैं उन्हें याद कर भावुक हो गयी. मुझे पता है वो जहां भी होंगे मुझे देखकर खुश होंगे और कह रहे होंगे की तुम ही मेरी चैंप हो….

Story By – Mansi Dhanak | Mission JOSH

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...