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हाईटैक ठगों ने ओटीपी मांग उड़ा लिए महिला के खाते से 75 हज़ार

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February 19, 2018

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हममें से बहुत से लोग नौकरी के लिए ऑनलाइन अपना बायोडाटा अपलोड करते हैं. कई तरह के फॉर्म भरते हुए भी हम अपनी फोन नंबर और पते जैसी जानकारियां ऑनलाइन या ऑफ़लाइन शेयर करते हैं.

नए ज़माने के हाईटैक ठग इन्हीं जानकारियां का इस्तेमाल कर लोगों के बैंक खाते लूट रहे हैं.

ठगी का ऐसा ही एक मामला सामने आया है जिसमें टेलीकॉलर ने यूज़र का ओटीपी हासिल कर 75 हज़ार रुपए साफ़ कर दिए.

दरअसल प्रिया नाम की एक टेलीकॉलर ने 37 वर्षीय रंजनी मेनन को कॉल करके कहा कि नौकरी के लिए उनका बॉयोडाटा सलेक्ट हो गया है.

प्रेसेसिंग फ़ीस के नाम पर उनसे एक वेबसाइट पर जाकर दस रुपए की पेमेंट करने के लिए कहा गया ताकि एप्लीकेशन को आगे बढ़ाया जा सके.

दस रुपए इतनी कम रकम है कि इसे चुकाते हुए शायद ही कोई हिचकिचाए. रंजनी भी ये फीस चुकाने के लिए तैयार हो गईं.

उन्होंने जब बताई गई वेबसाइट पर अपने एसबीआई क्रेडिट कार्ड से ऑनलाइन पेमेंट करने की कोशिश की तो पेमेंट फेल  हो गया.

इसके बाद उन्होंने अपने केनरा बैंक के डेबिट कार्ड से पेमेंट की वो भी फेल हो गई.

इस पर उन्हें फ़ोन पर गाइड कर रही टेलीकॉलर प्रिया ने उनसे कहा कि उनके पास एक ओटीवी आएगा वो उन्हें बता दें और पेमेंट वो वहां से कर देंगी.

ओटीपी बताते ही रंजनी मेनन के खाते से 75 हज़ार रुपए उनके खाते से ग़ायब हो गए. ये पैसा कई ई-वॉलेट में भेजा गया जहां से अगले ही बीस मिनट में दस ट्रांजेक्शन में इधर-उधर कर दिया गया.

मामले की जांच कर रहे मुंबई के एंटॉप हिल पुलिस स्टेशन के एक अधिकारी के मुताबिक वेबसाइट पर पेमेंट की कोशिश के दौरान पीड़िता के कार्ड की डीटेल्स चुरा ली गईं.

इस डीटेल के बाद ओटीपी मिलते ही उनके खाते से पैसे उड़ा लिए गए.

बैंकों अपने ग्राहकों से किसी भी स्थिति में अपना ओटीपी किसी से शेयर न करने के लिए कहती हैं.

कैसे ही हुई ये धोखाधड़ी

फ़र्ज़ी वेबसाइट के ज़रिए पीड़िता की कार्ड डीटेल्स चुरा ली गईं.

एक बार कार्ड डीटेल्स मिलने के बाद ओटीपी (वन टाइम पासवर्ड) ले लिया गया.

ओटीपी का इस्तेमाल कर बैंक अकाउंट से पैसा ख़र्च कर दिया गया.

क्या होता है ओटीपी

वन टाइम पासवर्ड या ओटीपी डिजीटल बैंकिंग में सुरक्षा की वो आख़िरी दीवार है जिसके ढहने पर फ़र्ज़ीवाड़ा रोकना बहुत मुश्किल है. दरअसल बैंकें डिजीटल ट्रांजेक्शन को वेलिडेट करने के लिए उपभोक्ता के रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर एक ओटीवी यानी वन टाइम पासवर्ड भेजती हैं जिसे सही से डालने पर ट्रांजेक्शन अप्रूव्ड हो जाती है. यानी अगर किसी के पास ओटीवी है तो वो ट्रांजेक्शन कर सकता है.

बैंकें इसे ट्रांजेक्शन की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इस्तेमाल करती हैं. हम जब भी ऑनलाइन पेमेंट करते हैं बैंकें हमारे पास ओटीपी भेजती हैं और उस ओटीपी को दायर करने के बाद ही पेमेंट होती है.

कॉपी हो सकती हैं बैंक डिटेल्स

किसी ग्राहक के कार्ड के बारे में जानकारी अवैध वेबसाइट के ज़रिए कॉपी की जा सकती है या वैध वेबसाइट में सेंध मारकर भी हासिल की जा सकती है. उदाहरण के तौर पर अगर आपने कभी अपने कार्ड से पेटीएम पर पेमेंट की है और पेटीएम के सर्वर हैक हो जाएं तो बहुत मुमकिन है कि हैकरों के पास आपके कार्ड डीटेल्स आ जाएं.

लेकिन उन कार्ड डीटेल्स से तब तक ट्रांजेक्शन नहीं हो पाती जब तक ग्राहक का ओटीपी ऑनलाइन ठगों को नहीं मिलता.

किसी से साझा न करें ओटीपी

अपने बैंक की ओर से भेजे गए ओटीपी को कभी भी किसी से साझा न करें. इसका इस्तेमाल कर आसानी से चपत लगाई जा सकती है.

मुंबई में रंजनी मेनन से हुई ठगी के मामले की जांच अब पुलिस कर रही है.

लेकिन ये अपनी तरह का इकलौता मामला नहीं हैं. फ़र्ज़ी कॉलसेंटरों से फ़ोन करके ठग रोज़ाना इस तरह से लोगों की मेहनत की कमाई लूट रहे हैं.

ऐसी ठगी की एक वजह जांच एजेंसियों की उदासीनता भी है.

फ़र्ज़ी दस्तावेज़ों के आधार पर सिम कार्ड हासिल करके लोगों को कॉल किए जाते हैं.

ऐसे में पुलिस में मामला दर्ज हो जाने के बावजूद पुलिस के लिए ठगों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है.

ऐसी घटनाओं से बचाव का एकमात्र रास्ता यही है कि अपने बैंक खातों की संवेदनशील जानकारियों को कभी किसी से साझा न करें.

और अपना ओटीपी तो भूलकर भी किसी को न बताएं.

टेलीकॉल को हमेशा शक़ की निग़ाह से देखें और अनजान कंपनियों के कॉल को पूरी तरह इग्नोर करें.

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