मेरी कहानी

मेरी कहानीः उस दिन कुछ ऐसा हुआ कि किसी को यक़ीन नहीं हुआ…

तर्कसंगत

March 19, 2018

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लोग कहते हैं कि एक उम्र के बाद हम अपनी बचपन की यादों को भूल जाते हैं. शायद ये सच हो लेकिन मुझे आज भी अपने बचपन के वो दिन याद हैं.

मैं केले के पत्ते पर लेटी हुई अपनी मां का चेहरा तकती रहती थी. वो मेरे सर पर पानी डालती रहतीं. मैं सिर्फ़ तीन साल की थी. सबको लगता था कि मैं मर ही जाउंगी. मुझे चेचक का भयानक संक्रमण हुआ था.

मेरी मां ने अपने दुपट्टे से मेरे हाथ बांध दिए थे क्योंकि मैं अपने चेहरे की खाल नोच लिया करती थी. मुझे याद नहीं कि मैं कितने दिन उस केले के पत्ते पर लेटे रही थी. मेरी मां के सिवा कोई मुझे छूता भी नहीं था. ये एक भयानक संक्रामक रोग था.

चेचक के बाद का मेरे बचपन की यादें बहुत अच्छी नहीं हैं. मेरी मां मेरे सामने शीशे का इस्तेमाल नहीं करती थीं क्योंकि मैं मां के शीशे में अपना चेहरा देखकर ही डर जाया करती थी.  जब मैं नदी में नहाने जाती तो अपने आप को पूरा ढककर जाती थी. पानी में मुझे अपने चेहरे का अक़्श दिखता.

People say we forget about our childhood memories after a certain age. Maybe it’s true but I can remember those early…

Posted by GMB Akash on Tuesday, 13 February 2018

हम तीन बहनें हैं और मैं सबसे बड़ी हूं. बचपन से ही मैं सब्र वाली सीधी सादी लड़की थी. मुझे घर से बाहर निकलना अच्छा नहीं लगता और मैं रसोई में मां का हाथ बंटाती रहती. मैं हमेशा अपनी त्वचा और चेहरे के दागों को लेकर चिंतित रहती. मेरी मां मुझे ही सबसे ज़्यादा प्यार करती और हमेशा मेरे लिए दुआ करती.

मेरी मां और मेरे पिता को मेरी चिंता सताती रहती. शायद यही वजह है कि बहुत कम उम्र से ही मेरे पिता मेरी शादी की कोशिश कर रहे थे. लेकिन मेरे जैसे चेहरे वाली लड़की से कौन शादी करता? मेरे मन में कभी शादी की चाह नहीं होती. अपनी त्वचा की वजह से मुझे लोगों के सामने जाना और अपने बारे में उनकी राय सुनना बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता. लेकिन मेरे पिता कभी ये बात समझ नहीं पाए. उन्होंने बहुत से लड़के तलाश किए. सबने एक के बाद एक मुझे नकार दिया. नकारा जाना मेरी आदत सा हो गया. मेरी मां हर बार मेरे लिए दुआ करती और मैं मां से कहती कि ये आख़िरी बार है.

बचपन में ही मैंने आलोचना को सहने की कला सीख ली थी. शायद यही वजह थी कि मैं अपने पिता की शादी की मांग और लोगों की आलोचनाओं को सहती गई.

मेरी दोनों छोटी बहने मुझसे कहीं ज़्यादा सुंदर थी. उन्हें देखने के लिए बहुत से लड़के आ रहे थे. लेकिन उस एक दिन के बाद मेरी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई. मैंने कभी नहीं सोचा था कि ऐसा कुछ हो जाएगा. हममें से किसी ने भी ऐसा नहीं सोचा था.

एक लड़का मेरी छोटी बहन को देखने आया और उसने मुझे पसंद कर लिया. उसके घरवाले राज़ी नहीं थे लेकिन वो ज़िद पर अड़ गया. मेरे पति ने मेरा जीवन पूरी तरह बदल दिया. मैं कभी जान नहीं पाई कि उन्होंने मुझमें, मेरे इस चेहरे के साथ क्या देखा. मुझे विश्वास नहीं हो पाया कि चेहरे पर इतने दाग़ के बावजूद कोई मुझे प्यार कर सकता है. मैंने उनकी आंखों में अपने लिए प्यार देखा.

उनके सच्चे प्यार ने मुझे बहुत आत्मविश्वास दिया. मैंने उनसे कई बार पूछा कि वो मुझे क्यों प्यार करते हैं? मैं बदसूरत दिखती हूं? वो हमेशा कहा करते कि मेरी नज़र से देखो तुम्हें पता चलेगा कि तुम कितनी ख़ूबसूरत हो. मैं सिर्फ़ तुम्हारी त्वचा से ही नहीं बल्कि तुमसे प्यार करता हूं. उनके जवाबों ने मेरा सामने हमेशा ज़िंदगी का अलग नज़रिया रखा.

मैं मानती हूं कि ज़िंदगी ज़ख़्म देती है लेकिन उन्हें निश्चित रूप से भरती भी है. अब मुझे अपने दाग़ों में सुंदरता नज़र आती है. शादी के बाद मुझे अपनी त्वचा को लेकर कभी कोई दिक्कत नहीं हुई. मुझे कभी लगा ही नहीं कि मेरे जीवन में कोई समस्या है. मैंने कभी नहीं चाहा कि मैं उन दाग़ों से पीछा छुड़ा लूं क्योंकि वो मेरा हिस्सा हैं और मैंने कभी उनकी आंखों में अपनी त्वचा को लेकर कोई शिकायत नहीं देखी. वो मुझे सुंदोरी कहते हैं. पिछले 50 सालों में अपना नाम भूल सी गई हूं. मेरे पोती-पोता, गांव वाले सभी मुझे सुंदोरी के नाम से ही जानते हैं.

स्रोतः जीएमबी आकाश

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