मेरी कहानी

मेरी कहानीः कभी मैं खाने से मोहताज था, आज सपनों की कार में चलता हूं

Poonam

March 19, 2018

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मैं तब पांच साल का था जब एक दिन मेरे पिता घर से निकले और लौट कर नहीं आए.  हमें कभी नहीं पता चला कि उनके साथ क्या हुआ लेकिन हमारा पूरा जीवन उस दिन के बाद से बदल गया.

मेरी अनपढ़ मां को मेरा और मेरी बहन का पेट भरने के लिए तुरंत काम पर लगना पड़ा.  शुरुआत के कुछ साल हम अपने संयुक्त परिवार के साथ रहते रहे. मेरी मां ने हमारी ज़रूरतें पूरी करने के लिए तमाम तरह की नौकरियां की.

जब मैं 16 साल का हुआ तो हमारा संयुक्त परिवार बंट गया और हम अकेले हो गए. मैं अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के घरों में रह रहा था. इस दौरान मेरी मां और बहन अलग-अलग नौकरियां कर रहीं थीं और हॉस्टल में रह रहीं थीं.

मेरा सिर्फ़ एक ही सपना था. अपने परिवार के लिए अपना एक घर हो जहां हम सब फिर से साथ रह सकें.

कॉलेज के मेरे दिन बहुत मुश्किल थे. मैं दिन में क्लास में रहता और रात को होटलों में काम किया करता.  काम पर आना जाना बेहद मुश्किल था क्योंकि मेरे पास ज़्यादा पैसे नहीं थे. मैं ट्रेन से जाता और बाकी का सफर पैदल तय करता.

जब मैं कॉलेज में तीसरे वर्ष में था तब मेरा सारा पैसा ख़त्म हो गया और मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ी. मैं  बेघर था और संघर्ष से थक चुका था. मेरे दिमाग़ में मेरी मां और बहन के अलावा कोई नहीं था.

"I was 5 years old when my father stepped out of the house and didn’t come back. We never found out what happened to…

Posted by Humans of Bombay on Sunday, 18 March 2018

मैंने विदेश में एक ऑयल प्लेटफार्म पर काम कर रही एक भारतीय कंपनी में नौकरी करने का निर्णय किया. ये ऐसी नौकरी थी जिसे कोई करना नहीं चाहता था. हर दिन जान का ख़तरा. हम हेलीकॉप्टर के ज़रिए जहाज़ तक पहुंचते. ज़मीन हमसे सौ मील दूर थी. हमें आपात स्थिति में ज़िंदा रहना सिखाया गया था.

अगले चार सालों तक मैं रोज़ाना 12 घंटे, महीने में 28 दिन काम करता रहा. मेरे पास और कुछ करने को था ही नहीं. मैं छुट्टियों में भी काम करता और हर तरह की उपलब्ध ट्रेनिंग लेता.

धीरे-धीरे मेरी पदोन्नती होनी लगी और मैं सीढ़ियां चढ़ने लगा.

1996 में अबु धाबी की एक कंपनी ने मेरी काबीलियत देखते हुए ऐसी नौकरी का प्रस्ताव दिया जिसे मैं ना नहीं कह सका. ये सिर्फ़ विदेश जाना का मौका नहीं था बल्कि मेरी सैलरी 1500 रुपए महीना से सीधे 40  हज़ार रुपए महीना भी हो गई थी.

मुझे आज भी अबु धाबी से बंबई की अपनी पहली यात्रा याद है. मैंने अपनी मां और बहन के लिए घर ख़रीदा. मैं फिर से अपने परिवार के सर छत का साया दे पाया.

अगले बीस सालों ने मेरा जीवन पूरी तरह बदल दिया. मैं बस ऊपर ही चढ़ता गया. कई कंपनियां बदली और दुनिया घूमीं.

आज मैं अपने जहाज़ का कप्तान हूं. 150 लोग मेरे दिशानिर्देशन में काम करते हैं. मैं जिस दुनिया की सबसे अधिक सैलरी वाले पदों में से एक पर हूं. भारत में मेरे पास कई संपत्तियां हैं और मैंने अपने सपने की दो कारें ख़रीद ली हैं.

मैं अपने बच्चों को अपने संघर्ष के बारे में ज़ोर देकर नहीं बताता, लेकिन वो मेरी कहानी जानते हैं और ये भी जानते हैं कि मैं उम्मीद करता हूं कि वो जो भी करें मेहनत से करें.

हो सकता है कि शुरुआत में मेरे पास कोई विकल्प नहीं था लेकिन फिर मैं अपनी नौकरी को पसंद करने लगा था. मैं अपनी नौकरी से बहुत प्यार करता हूं, उसने मुझे सबकुछ दिया है. मुझे लगता है कि कामयाबी के लिए जुनून सबसे ज़्यादा ज़रूरी है.

एक ज़माना था जब मेरे लिए सपने देखना भी बड़ी बात थी और आज मैंने अपने सब सपने पूरे कर लिए हैं. लगन और मेहनत का का फल हमेशा मिलता है. इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा कि मेरे पास कितना कम था, बस मैंने कभी हार नहीं मानी. और इसलिए ही मैं आज यहां पहुंच सका. भले ही इसमें बहुत ख़ून, पसीना और आंसू बहे.
(जैसा श्याम कबाड़कर ने ह्मूमंस ऑफ बांबे को बताया)

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