मेरी कहानी

मेरी कहानीः सच्चा प्यार कभी किसी को छोड़कर नहीं जाता है, वो हर दिन और बढ़ता है

Poonam

March 21, 2018

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मैं तब 17 साल का था जब मैं दिया से मिला था. हम आर्ट स्कूल में थे और हमारी दोस्ती को तुरंत पंख लग गए थे. वो मुझसे एक साल छोटी थी और जीवन से भरी थी. वो बस परफ़ेक्ट थी. अगले 11 सालों तक हम प्यार की अलग-अलग धुनों पर नाचते रहे, बिना ये जाने हुए कि हम प्यार करते हैं.

जब पढ़ने के लिए मैं कुछ सालों के लिए अहमदाबाद गया तो हमारा दूरी का रिश्ता भी चलता रहा. वो हर महीने मुझे चार ख़त लिखा करती थी. हमने एक दूसरे का इंतेज़ार करने का वादा किया था. मैंने उसकी ओर उतना ध्यान नहीं दिया जितना की उसका हक़ था. लेकिन उसने कभी शिकायत नहीं की. वो सब्र के साथ हमारे फिर से मिलने का इंतेज़ार करती रही.

साल 2003 में हमारी शादी हुई थी और अगले चार साल जन्नत जैसे थे.  हम एक दूसरे को तोहफ़े देते, फ़िल्में देखते, डेट पर डिनर करते, रोमांटिक यात्राओं पर जाते और साथ घूमने निकल पड़ते. हम दोनों को एक दूसरे में अपने सपने दिखाई देते. हमने अपने परिवार को बढ़ाने का भी सोच लिया था. इसी बीच अचानक उसे मिरगी का दौरा पड़ा.

स्कैन में उसके दिमाग़ के दाहिने हिस्से में एक ट्यूमर होने का पता चला. बीमारी का पता चलने के बाद हमें बताया गया था कि वो सात से दस साल तक जी सकती हैं. हमें ये भी बताया गया था कि सिर्फ़ उनकी देखभाल की जा सकती है और वो कभी पूरी तरह ठीक नहीं हो पाएंगी. हम कुछ भी करते लेकिन एक दिन मेरे जीवन का दिया बुझ ही जाना था.

उस दिन के बाद से तीन बार सर्जरी हुई और कई बार कैमियोथेरेपी और रेडिएशन थैरेपी हुई. ये सब सिर्फ़ उन्हें ज़िंदा रखने के लिए हो रहा था. वो कुछ सालों तक कैंसर होने के बावजूद पूरी तरह अपने ऊपर निर्भर रहीं लेकिन बीते तीन सालों में वो बहुत कमज़ोर हो गईं और मुझ पर निर्भर रहने लगीं.

हम दस सालों से ये जंग लड़ रहे हैं और गुज़रते साल के साथ वो कमज़ोर होती जा रही हैं. लोग समझते हैं कि मैं दिया की देखभाल करता हूं और भीतर से बहुत मज़बूत हूं लेकिन सज इसके उलट है. दरअसल मैं कमज़ोर रहा हूं और वो ही इस दौरान मुझे रास्ता दिखाती रही हैं. हमारे रिश्ते की शुरुआत से ऐसा ही है.

जब हम आर्ट स्कूल में थे तब दिया ने ही मुझे मेरा पहला कैमरा दिया था और उसे इस्तेमाल करना सिखाया था. उसने मुझे अहसास कराया था कि यादों को समेटना कितना ज़रूरी है. बीते दस सालों से मैं हम दोनों के साथ को कैमरे से समेट रहा हूं. ताकि वो हमेशा मेरे साथ रहे. क्योंकि मैं जानता हूं कि कोई भी पल हमारे साथ का आख़िरी पल हो सकता है.

जब मैंने दिया से प्यार किया था या महसूस किया था कि मैं उसे प्यार करता हूं तब वो अपने जीवन के सबसे शानदार दौर में थी. वो सबसे परफेक्ट थी. वो अपने आप के सर्वश्रेष्ठ रूप में थी. लेकिन सच्चा प्यार वो है जो मुझे अब महसूस होता है. मैं अब सिर्फ़ उसका पति नहीं हूं. मैं उसका साथी हूं. जीवनसाथी. उसका पिता हूं और मां भी.

जब आप किसी का ध्यान रखते हो तो आप कई भूमिकाएं निभाते हो और हर भूमिका अलग होती है. ये अलग तरह का प्यार होता है, वो प्यार जिसका तुम्हें पता ही नहीं था कि वो तुम्हारे भीतर है.

उसके साथ रहना कोई त्याग नहीं है बल्कि मेरी पसंद है जिसे मैंने चुना है. मैं दिया को बचा नहीं सकता हूं लेकिन मैं उसके हर रूप से प्यार तो कर ही सकता हूं.

जो होना है वो होकर रहेगा. हर दिन उसके साथ मेरा भी एक हिस्सा मर सा जाता है. मुझे हर रात अपनी चिंताओं को सुलाकर सुबह नई उम्मीद के साथ उठना होता है ताकि मैं उसे ख़ुश रख सकूं.

मेरे लिए ख़ुशी का मतलब अब सुबह उठना और मुस्कान के साथ उसे गले लगाना है. उसके बालों में तेल लगाना और उसे सिर से नहलाना हैं, उसका पसंदीदा खाना बनाना और उसे चाव से खाते देखना हैं.

मैं रात को पढ़कर उसे सुलाता हूं, एक प्यारी झप्पी देता हूं और वो नींद में खो जाती है. मैं चाहता हूं कि मेरा हर दिन ऐसे ही समाप्त होता रहा.

आज उसकी याद्दाश्त भी जाने लगी है और उसे बिस्तर में करवट बदलने के लिए भी मुझे याद दिलाना पड़ता है. ये सब बहुत मुश्किल हो सकता है लेकिन हम एक दूसरे के सबसे करीब इस दौरान ही आए हैं. हम इंसानों को प्यार की सच्ची शक्ति का तब तक पता नहीं चलता जब तक कि हमें अहसास नहीं होता कि हम बस उसे खोने ही वाले हैं.

लोग हैरत करते हैं कि मैं इस सबसे कैसे गुज़र रहा हूं. वो मुझे उसे छोड़ देने की सलाह देते हैं. लेकिन सच्चा प्यार कभी किसी को छोड़कर नहीं जाता है. उसने मुझे कितना कुछ दिया है. मैं आज जो भी हूं उसने ही बनाया है. मैं उसके लिए जो कुछ भी कर पा रहा हूं ये मेरा सौभाग्य है. मैं ये सब उसके लिए दोबारा करूंगा, हर जीवन में करूंगा क्योंकि वो सिर्फ़ मेरी अर्धांगनी नहीं हैं बल्कि वो मेरे भीतर है और मेरा जीवन बस उसके लिए ही है.

“I was 17 years old when I met Diya. We met in art school and our friendship blossomed immediately — a year younger and…

Posted by Humans of Bombay on Tuesday, 13 March 2018

स्रोतः ह्यूमंस ऑफ़ बांबे

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