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एक शिक्षक हर रोज 50 किलोमीटर की दूरी तय कर के पहुंचते हैं अपने इकलौते विद्यार्थी को पढ़ाने के लिए

तर्कसंगत

April 2, 2018

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भारत के कई दूर दराज के इलाकों में छात्र ना होने के कारण स्कूल बंद होने की कगार पर है. ऐसा ही एक स्कूल  महाराष्ट्र के पुणे जिले में भोर के पास चंद्रा गांव मे है,  जहाँ 29 वर्षीय शिक्षक रजनीकांत मेंढे हर रोज 12 किलोमीटर कच्ची सड़क का फासला तय करके पहुंच जाते है अपने एकलौते छात्र युवराज सांगले को पढ़ाने.

ये स्कूल पुणे से 100 किलोमीटर दूर एक छोटे से गांव में है जहां के 15 कच्चे मकान में बस 60 लोगों की आबादी बसती हैं.

हर रोज कठिनाईयों का सामना करते हैं मेंढे

रजनीकांत मेंढे को हर रोज कीचड़ से भरे सड़क से गुजरकर अपने स्कूल पहुंचने में बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है. वो इन कीचड़ से भरी सड़क को पिछले 8 सालों से लगातार पार करते आ रहे हैं.जब भी बारिश होती है सड़क पर चलना बहुत सरदर्द का काम हो जाता है. परेशानी यहीं खत्म नहीं होती बल्कि स्कूल पहुंचने पर उन्हें सबसे पहले युवराज को खोज कर लाना पड़ता है जो झाड़ियों में जाकर छिप जाता है क्योंकि कोई सहपाठी नहीं होने की वजह से उसका पढ़ाई में मन नहीं लगता.

ये गांव सांसद सुप्रिया सुले के विधानसभा क्षेत्र में आता हैं जहां अभी तक उन्होंने कदम भी नहीं रखा है. टाइम्स ऑफ इंडिया से हुई बातचीत में वहां के स्थानिय बताते हैं कि सरकार नाम का शब्द तब सुने थे जब पोलियो के टीके के लिए कुछ लोग गांव में आये थे.

चंद्रा गांव आखिर वीरान क्यों हो रहा है?

मेंढे जो नागपुर के रहने वाले है, चंद्रा गांव में शिक्षक के तौर पर तब आये थे जब स्कूल में 11 बच्चे हुआ करते थे. वो बताते हैं की उनके भी स्कूल में होनहार छात्र हुआ करते थे लेकिन अच्छी उच्च शिक्षा पाने के लिए वो सारे बच्चे वहां से 12 किलोमीटर दूर एक छोटे से गांव मनगाव चले गये. गांव की अधिकतर लड़कियों को उनके माता– पिता गुजरात भेजते है जहां  फैक्ट्रियों और खेतों में उन्हें रोज़गार मिल जाता है. मेढ़े बताते हैं कि उन्होंने बच्चों के माता-पिता को बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन उनकी सारी मेहनत बेकार गई.

स्कूल का निर्माण 1985 में हुआ था जब सिर्फ चार दीवारें खड़ी की गई थी, और कुछ ही साल पहले उपर छत डाला गया है. टाइम्स ऑफ इंडिया को मेढे बताते हैं कि एक बार तो छत से नीचे एक सांप उनपर आ गिरा, फिर बार तो कीचड़ में गाड़ी से रास्ता निकालते हुए फिसल कर सांप के उपर ही वो गिर गये. और तीसरी बार अगर सांप से मुलाकात हुई तो बचना मुश्किल लगता है.

बिजली ना होने के बावजूद मेंढे ने एक छोटे टीवी सेट और  थोड़ी वायर के साथ ई– लर्निंग सुविधा का जुगाड़ किया है. गाववालों की मदद से उन्हें 2 साल पहले एक 12 वोल्ट के सोलर पैनल मिला है जो उन्हें वो टीवी सेट चलाने में मदद करता है. जिसकी मदद से वो बच्चों के लिए पढ़ाई के लिए जरूरी कंटेंट डाउनलोड कर लेते है. उन्होंने 2 टैबलेट भी खरीदे हैं जिससे युवराज की पढ़ाई में रूची बढे और वो इस दुनिया को और बेहतर तरीके से समझ सके. बाकी बच्चे उनकी उम्र के बच्चों के साथ  खेलते और सीखते हैं, पर युवराज के पास सिर्फ मैं ही हूं. उनके लिए स्कूल सिर्फ चार दिवारी है खाली बेंच के साथ.

चंद्रा गांव में पेट भरने के लिए बहुत ही काम साधन है. कुछ गायें और पत्थर तोड़ने के अलावा वहां के लोगों के पास कोई काम नहीं है. 49 वर्षीय बबन सांगले अपनी मुंबई की नौकरी छोड़कर अपनी बुजुर्ग मां की देखभाल के लिए गांव आये हैं. गांव को देखकर वो बताते हैं इस गांव में कुछ भी नहीं है. हम अभी भी मिट्टी के तेल के दिए जलाते है. 3 सोलर लैंप जो रास्ते पर हैं वो कई साल पहले बंद हो चुके हैं. सोलर पैनल की मदद से हम सिर्फ एक बल्ब और फोन चार्ज करने लायक बिजली निर्माण कर सकते है.

गांव की दूर्दशा और वीरानियत ने कई जाने भी ली है. एक महिला बताती है की ह़ॉस्पीटल पहुंचने से पहले ही बुखार के कारन उसके पड़ोसी की मृत्यु हो गयी क्योंकि गांव से 63 किलोमीटर दूर हॉस्पीटल है. गाववालों ने उसे बांस से बने स्ट्रेचर पर ले जाकर उसे बचाने की कोशिश की लेकिन फिर भी देर हो गयी.

गांववालों को तभी मदद मिलती है जब वो बीमार पड़ते है. नौजवान तो नौकरी की तलाश में गांव छोड़कर शहर चले जाते हैं, पर बुजुर्ग और बीमार लोगों को इस बंजर गाव में रहने के अलावा और कोई चारा नहीं है.

मेंढे बोलते है कि जिला परिषद के शिक्षक  5 साल के बाद तबादले के लिए आवेदन कर सकते हैं. पर ये तभी मुमकिन है जब कहीं और पद खाली हो. एक और साथी शिक्षक  मनोज आंद्रे जो पास ही एक कस्बे में पढ़ाते हैं तबादले की आस लगाए हुए है. पर उनके स्कूल में 9 बच्चे हैं जब की मेंढे सिर्फ एक छात्र को पढ़ाते हैं. मेंढे कहते हैं कि ये किसी चमत्कार से कम नहीं की वो 8 साल से वो वहां जाकर पढ़ाते हैं.

वो दोनों अपने परिवार के साथ खानापुर में रहते हैं जो स्कूल से 50 किलोमीटर दूर है. लेकिन उनके परिजनों को पता भी नहीं है कि ये दोनों किन मुश्किल हालातों का सामना करते हैं. मेंढे सर और मैंने अपने परिवार वालों को  नहीं बताया है कि हमारे स्कूल कितने दूर है, क्योंकि वो ये बात जानकर परेशान हो जाएंगे. आंद्रे बताते हैं कि हम मुश्किल से छुट्टियां कर पाते हैं, क्योंकि हमारी जगह कोई और शिक्षक पढ़ाने के लिए नहीं आना चाहेगा.

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