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आँखों की कमी ने हौसलों को कम नहीं होने दिया, नेत्रहीन आई.ए.एस अफसर अजीत की कहानी

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May 12, 2016

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“हमारा अंधापन हमहीं तक सीमित है, हम उतना ही देख सकते हैं जितना हम देखना चाहते हैं।”

प्रोफेसर से आईएएस अफसर बने अजीत कुमार यादव की कहानी इस बात की नज़ीर है कि अगर हम जीवन में कुछ पाने का हट और ज़िद कर लें तो निश्चित ही पा कर रहते हैं। पाँच साल की कम उम्र में अपनी आँखें खो कर भी अजीत भारत के दूसरे ऐसे नेत्रहीन अभ्यार्थी बने जिन्होंने आईएएस का प्रख्यात पद हासिल किया।

आँखों की रोशनी खो कर भी उनकी मंज़िल हमेशा उनके सामने थी, वो शुरू से ही एक मेधावी छात्र रहे। कक्षा १० में वो प्रथम आए और विश्वविद्यालय अनुदान समिति(UGC) द्वारा आयोजित नेशनल एलिजिबिलिटी टेस्ट(NET) में सफल हो कर दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर के पद पे नियुक्त हुए। वर्ष 2005 में जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नेत्रहीनों के लिए आईएएस का रास्ता खोल दिया तो वो इसकी तैयारी में जुट गए।

कामयाबी और संघर्ष की दास्ताँ

अजीत ने वर्ष २००८ में लोक सेवा की परीक्षा दी और दो सौ आठवां स्थान प्राप्त किया। उनको उम्मीद थी कि उन्हें आईएएस के लिए चुना जाएगा पर इसकी जगह उनको भारतीय रेल में नौकरी का प्रस्ताव आया। उन्होंने इस फैसले के खिलाफ लड़ने की ठानी और मुक़दमा दायर किया। केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण(Central Administrative Tribunal) ने वर्ष 2010 में उनके हक़ में फैसला सुनाया पर उनकी लड़ाई यहीं खत्म नहीं हुई। दो वर्ष और संघर्ष करने के बाद आखिर १४ फरवरी, २०१२ को उनका नियुक्ति पात्र उनकी चौखट पर था।

फ़र्ज़ के रास्ते में भी अव्वल

अपनी ट्रेनिंग खत्म करने के बाद अजीत ने वर्ष 2012 में त्रिपुरा के उद्योग विभाग के संयुक्त सचिव का कार्यभाल सम्भाला और वर्ष 2014 से वो अम्बस्सा, त्रिपुरा के अनुभागीय जिलाधिकारी हुए(SDM)। ब्रेल कलम तथा अन्य सॉफ्टवेयर्स की मदद से अजीत अपने फ़र्ज़ को बहुत अच्छे से निभाते हैं। अजीत के लिए कर्म ही पूजा है और वो अपने छेत्र में कानून का राज लाना चाहते हैं, कानून तोड़ने वालों के खिलाफ वो बहुत सख्ती से पेश आते हैं। उनको अन्याय से घृणा है और ये बात तब और भी सिद्ध हो गई जब उन्होंने एक छोटी सी अनाथ बच्ची का जबरन विवाह रुकवा दिया और उसके 40 वर्षीय दूल्हे को सलाखों के पीछे धकेल दिया।

अजीत कहते हैं, “अगर आप समाज में बदलाव चाहते हैं तो आप लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनें, मेरा काम सिर्फ आईएएस बन कर खत्म नहीं हुआ है, बल्कि शुरू हुआ है।”

अजीत अपने आप में बदलाव की एक बयार हैं, उनका अथक प्रयास और ना टूटने वाली हिम्मत बाकी लोगों के लिए एक मिसाल है। आईएएस जैसे पद पर काबिज़ हो कर उन्होंने बाकी लोगों को एक राह दिखाई है कि अगर आप के अंदर अपना सपना पूरा करने की मेहनत और लगन है तो कोई भी सपना हक़ीक़त बनाया जा सकता है। नेत्रहीन होकर भी उन्होंने जो हासिल किया वो हम सब आँख वालों के लिए एक सबक ही है। हम आशा करते हैं कि हमारे पाठक और स्वयं हम भी अजीत से बहुत कुछ सीखेंगे।


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