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दिल्ली के 24 वर्षीय युवक ने जगाई आस; गोद लिया गाँव

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May 12, 2016

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चित्र स्रोत: राहुल प्रसाद 

“नाउम्मीदी और उम्मीद, दोनों से सामना हुआ पर मैं खुश हूँ कि ज़िंदगी ने यह सब बहुत पहले दिखा दिया।”

“मैं चाहता हूँ सकारात्मक सोच वाले लोगों की वृद्धि हो जो बदलाव की इस बयार में सहायक हों। अब मेरे लिए यह गाँव मेरा दूसरा घर है।”

24 वर्ष, उम्र ही कितनी होती है? मगर दिल्ली का यह नौजवान एक साल से वो कर रहा है जो इस उम्र में शायद ही कोई सोचता हो। आर वी कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष के छात्र, राहुल प्रसाद ने भद्रपुर नामक एक छोटे से गाँव को गोद लिया है जो कर्नाटक के रामनगर डिस्ट्रिक्ट की मैसूरू रोड से 3 कि.मी की दूरी पर है।

शुरुआत
यह कहानी शुरू हुई चार साल पहले जब राहुल पहली बार इस गाँव, बच्चों के मेडिकल कैंप के लिए आए। वो और कुछ अन्य स्वयंसेवक दाँतों के ब्रश, साबुन एवं अन्य ज़रूरी सामान लेकर ‘हक्की पिक्की’ आदिवासी समूह के लोगों के पास आए और उन्हें स्वच्छता की ज़रूरत बताई।

पहल
स्वच्छता पर कई कैंप लगाने के उपरांत भी राहुल को यह आभास हुआ कि कुछ भी नहीं बदला है। गाँव के लोगों के विकास और स्वच्छता को सिर्फ टूथब्रश और साबुन से ही गति नहीं प्रदान की जा सकती, लगातार प्रयास से ही अनुकूल परिणाम मिल सकता है।

यही सोचकर राहुल ने 140 परिवारों सहित पूरे गाँव के समुचित विकास के लिए गोद ले लिया। उनका लक्ष्य था कि गाँव के लोगों की जीवन शैली में सुधार किया जाए और भद्रपुर को एक ‘स्मार्ट गाँव’ बनाया जाए।

राहुल की संस्था ‘जुवेनाइल केयर चैरिटेबल ट्रस्ट’ गरीब बच्चों के उत्थान की ओर कार्यरत है। इस संस्था ने मनचाणक्यकनाहल्ली पंचायत के विकास अधिकारी के साथ क्षेत्राधिकार का अनुबंध किया है एवं जन कल्याण का कार्य शुरू कर दिया है। जहां राहुल नियमित तौर पर अपने गाँव जाते हैं, वहीं उनके स्वयंसेवक दल के लोग हर सप्ताह के अंत पर जन कल्याण के कार्य में शामिल होते हैं।

राहुल के कार्य

राहुल और उनके दल ने गाँववासियों के स्वास्थ्य से जुड़े चिंता के तीन मुख्य कारण ढूँढ निकाले:

1)आई.टी सिटी से महज़ 50 कि.मी दूर होने के बावजूद भी गाँव में स्वच्छता का ना होना।

2)सड़क किनारे की भरी हुई नालियाँ जो मच्छरों के पनपने में सहायक होती हैं।

3)खुले में शौच, जो भारत में आज भी एक हकीक़त है।

गाँव की स्तिथि दयनीय है। सबसे नज़दीक का अस्पताल भी, गाँव से 8 कि.मी दूर है। हालाँकि, इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि राहुल और उनका दल इस दूर-दराज के गाँव को विकसित करने का काम बड़ी कुशलतापूर्वक कर रहे हैं। यह लोग कपड़े इकठ्ठा कर गाँववासियों में बांटते हैं, ख़ासकर गर्भवती महिलाओं को। यह दल मुख्य सड़क के नीचे सेंसर लगा कर, पीजोइलेक्ट्रिक जनरेटर की सहायता से बिजली की समस्या के निदान के लिए भी प्रयासरत हैं। गाँव में ही स्टार्ट अप के द्वारा रोज़गार पैदा करने के विकल्प तलाशे जा रहे हैं जिससे गाँव को शहरों से जोड़ा जा सके।

अभिस्वीकृति
पिछले मार्च में, गैर सरकारी संगठनों के भारतीय कंफेडेरशन और संयुक्त राष्ट्र की ओर से राहुल को प्रख्यात ‘संयुक्त राष्ट्र कर्मवीर चक्र’ और ‘आर ई एक्स वैश्विक साहचर्य’ से नवाज़ा गया जो की सक्रिय स्वयंसेवकों के लिए राष्ट्रीय पदक है। इतना सब कुछ, मात्र 24 वर्ष की आयु में!

राहुल कहते हैं : “यह सफ़र मेरे लिए आसान नहीं था। गाँव को संभालना अपने आप में ही एक जटिल कार्य है। नाउम्मीदी और उम्मीद, दोनों से सामना हुआ पर मैं खुश हूँ कि ज़िंदगी ने यह सब बहुत पहले दिखा दिया। मैं चाहता हूँ सकारात्मक सोच वाले लोगों की वृद्धि हो जो बदलाव की इस बयार में सहायक हों। अब मेरे लिए यह गाँव मेरा दूसरा घर है।”

अब भद्रपुर, राहुल का गुरूर है। उन्होंने जो बदलाव लाने की पहल की है, अब वो स्पष्ट रूप से नज़र आने लगे हैं।

तर्कसंगत सलाम करता है इस नौजवान उद्यमी के ज़ज्बे को। एक ऐसे समाज में, जहाँ लोग अक्सर अपने दुखों और परेशानियों का ढिंढोरा पीटते हैं और लक्ष्य हासिल ना कर पाने पर शिकायत करते हैं, ऐसे में राहुल प्रसाद जैसे लोग बदलाव के दीपक की लौ जला रहे हैं।


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