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बेज़ुबान बंदर एसिड से जलकर मर गया, इंसानों की जीत हुई पर इंसानियत की हार

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May 12, 2016

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लेख का स्रोत: पवन शर्मा 

हमारा समाज एक ऐसी राह पर है, जिस राह पर संवेदनाओं का कोई अस्तित्व ही नहीं है।
कुछ दिन पहले, भांडुप, मुंबई में एक बंदर पर कुछ लोगों ने एसिड फेंक दिया। उनकी मानें तो यह काम करना उनके लिए लाज़मी था क्यूँकि बंदर उनके आवास-क्षेत्र में दखल दे रहा था परंतु सत्य कुछ और ही है। वातावरण एक प्राकृतिक परिवेश है, और प्राकृतिक वातावरण पृथ्वी पर जीवन के अस्तित्व में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। मनुष्य के स्वार्थी गतिविधियों के कारण तथा डेवलपमेंट के नाम पर आए दिन जंगलों को काटा जा रहा है, हम किसी ना किसी प्रकार से प्रकृति के नियमों को बदल रहे हैं, उसकी अपनी ज़िंदगी से हस्तक्षेप कर रहे हैं। लेकिन उसके दुष्परिणामों से हम सामना करने को तैयार नहीं हैं।

एसिड फेंके जाने की वजह-
दरअसल, स्थानीय निवासियों ने वन-विभाग को बंदरो के समूह द्वारा मचाए जा रहे उत्पात के बारे में बताया था। परंतु काफ़ी समय बीत जाने के बावजूद भी, उचित कार्यवाही नहीं की गई। भांडुप के निवासियों ने वन-विभाग के अधिकारियों को वहाँ आकर स्थिती का मुआयना करने के लिए कहा और इस स्थिती से जल्द से जल्द निपटने के लिए कहा परंतु इस रात की सुबह होती नजर नही आ रही थी, समस्या बढ़ती गई और लोगों ने यह घिनौना क़दम उठा लिया।

कृपया ध्यान दें-
तीन दिन तक मेरी टीम इस बुरी तरह झुलस चुके बंदर को बचाने की कोशिश करती रही और मैने इस संदर्भ में हर दिन सम्बंधित अधिकारियों को सूचित किया कि हमें अनुभवी विशेषज्ञो की तथा अन्य सामग्रियों की ज़रूरत है। देरी से सही, किसी तरह हम तक मदद पहुँची।

जैसे कि हम सब जानते हैं कि शहर के वन अधिकारियों के पास ऐसी स्थिती से निपटने के लिए राष्ट्रीय उद्यानों के बाहर बुनियादी चीज़ें, उपकरणों की कमी होती है, इसी कारण प्रबंधन मे कमी दिखाई पडती है।

हम जंगलो पर अतिक्रमण करते हैं, हम बंदरो को खाने-पीने का लालच देकर अपनी ओर आकर्षित करते हैं, उन्हें अपने ऊपर निर्भर बनाते हैं।

हम उन्हें आमंत्रित करते हैं और फ़िर हम ही उनसे छुटकारा पाना चाहते हैं। सच तो यही है कि इस समस्या के लिए केवल हम ही ज़िम्मेदार हैं।

सरकार हमेशा से ही वन्यजीवन के मुद्दों को नज़रअंदाज़ करती आ रही है। बचाव दल एवं बचाव केंद्र की कमी काफ़ी समय से है। आम लोगों में भी वन्यजीवन के बारें में जागरूकता ना के बराबर ही है।
जब तक जागरूक, सचेत आम आदमी और सरकारी तथा गैर-सरकारी एजेंसियाँ एक समाज के रूप में एकजुट नहीं होती हैं तब तक इस स्थिती से उबर पाना नामुमकिन है।

जिस तरह इन समस्याओं ने धीरे-धीरे उग्र रूप धारण किया है, उसी तरह इनके निवारण में इससे दुगना समय आर द्रण संकल्प और प्रयास की आवश्यकता होगी।

पर हमें तो बस एक रात में ही परिवर्तन चाहिए, हमने धैर्य खो दिया है। किसी समस्या से निजात पाना हो तो, समय तो लगेगा ही। सरल सा तर्क है, जब भोजन के पश्चात पाचन क्रिया में हमें समय लगता हैं तो फिर परिवर्तन के संदर्भ में भी ऐसा होना स्वाभाविक हैं।
मेरे जैसे कुछ लोग ज़मीनी स्तर पर काम करके, शहरी वन्यजीव संरक्षण में थोड़ी-बहुत भूमिका निभा रहे हैं पर बिना लोगों के साथ आए कुछ नहीं किया जा सकता।

कुछ लोग क्रूरता की हद पार कर चुके हैं, उनके अनुसार शहर उनकी मिल्कियत है, एक तरह का विरोधाभास हम सभी के ज़हन में मौजूद है।

हम लोग शनिवार के दिन भगवान की पूजा करके समाज में अपनी झूठी श्रद्धा और आस्था का ढिंढोरा पीटते हैं पर भगवान का ही एक रूप कहे जाने वाले एक बेज़ुबान जानवर को इतनी निर्ममता से कष्ट पहुँचाते हैं।

मुझसे जो बन पड़ता है मैं इन जानवरों के लिए करता हूँ, पर क्या आप करेंगे, क्या आप सोचेंगे, क्या आप समझेंगे।

इन लोगों का आभार-

हम बंदर को लोगों के चंगुल से निकाल पाने मे कामयाब रहे, उसे ठाणे स्थित SPCA भेज दिया, जहाँ डाॅक्टर दीपा कटयाल ने उसका प्राथमिक इलाज किया। उस बंदर को उसी अस्पताल में भरती भी कर दिया गया जहाँ उसकी अच्छे से देखभाल की जाएगी। मैं दीपा को हृदय की गहराइयों से धन्यवाद करता हूँ, उनके बिना कुछ भी संभव नहीं था।

मैं अपने साथी जीत, हर्षित और परीन का भी धन्यवाद करना चाहता हूँ, वो इस काम में शुरू से लेकर अंत तक मेरे साथ थे।

बदकिस्मती से बंदर ने चेहरे और छाती पर गहरी चोटों के चलते दम तोड़ दिया। हमले की भीषणता इतनी थी कि उसे बचा पाना असंभव था परंतु डाॅक्टरों के समूह द्वारा किए गए प्रयासों को, कार्यकर्ताओं के जज़्बे को, हम सलाम करते हैं। एक ऐसे समय में जब लोग मरते हुए इंसान को सड़कों पर अनदेखा कर देते हैं, उस समय एक जानवर की जान बचाने के लिए इतना कष्ट उठाने वालों को हमारा नमन। हम पाठकों से यह आशा करते हैं कि वह भी जान की कीमत समझेंगे, इंसानों की भी और जानवरों की भी।


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