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भलाई का बदला भलाई ही होती है, एक कहानी जो बताती है कि हमारे समाज में अभी भी दयालुता और प्यार जीवित है

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May 12, 2016

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लेख का स्रोत:फसालू केवीके | चित्र स्रोत:अखिलेश कुमार 

इस कहानी के पात्र का काल्पनिक नाम प्रेम है।

प्रेम अपनी कंपनी के वार्षिक सम्मलेन में मलप्पुरम गया हुआ था। कई सारे लोग आए थे, कंपनी की योजनाओं और आगे के इरादों पर भाषण हुआ, लोग ना चाहते हुए भी एक दुसरे से हँस कर मिले और किसी तरह एक और सम्मलेन समाप्त हुआ।

सम्मलेन के बाद प्रेम अपने होटल वापस गया, नहा-धो कर उसने मीटिंग का सारा भाषण भी धुला और अपनी थकान को भी और पास के रेस्टोरेंट में खाना खाने चला गया। रेस्टोरेंट काफी शानदार और अच्छा था। भीड़ ज़्यादा थी, सारे टेबल खचा-खच भरे थे और रह-रह कर स्वादिष्ट पकवानों की खुशबु से उसके मुँह में पानी आ रहा था। मलप्पुरम अपने व्यंजनों के लिए बहुत प्रसिद्ध था।

प्रेम ने चिकन करी और साथ में रोटी और चाय मँगवाई। कुछ ही समय में खाना उसके समक्ष था और वो अभी उसको खाने की सोच ही रहा था कि उसकी नज़र रेस्टोरेंट के शीशे के बहार खड़े एक मासूम बच्चे पर पड़ी। पथराई अाँखों से वो रेस्टोरेंट के हर टेबल को देख रहा था, कपड़ों के नाम पर शरीर पर चीथड़े लिपटे हुए थे। उसको देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसने सदियों से खाना नहीं खाया था। उस बच्चे के हाथ में एक बोरा था जिसमें शायद सड़क का कचरा भरा था। अजीब बात थी कि उसका बोरा भरा हुआ था पर पेट नहीं, वहाँ उपस्थित किसी भी इंसान की नज़र उस बच्चे पर नहीं पड़ रही थी, उसके भूखे पेट पर पड़ने की बात तो दूर की कौड़ी थी। जो किसी की नज़र पड़ती तो वो उसे घृणा और संकोच की दृष्टि से ही देख रहा था।

इस मार्मिक दृश्य पर प्रेम का हृदय चोटिल हो गया, उसे अपनी भूख का कोई ध्यान नहीं रहा और उसने उस बच्चे को इशारा करके अपने पास बुलाया। वह बच्चा आने लगा तो मालूम पड़ा कि वह अकेला नहीं था, उसके साथ एक छोटी से बच्ची, जो शायद उसकी बहन थी, वो भी अपने नन्हें-नन्हें पैरों से खाने की तरफ दौड़ पड़ी। पास आ कर दोनों रुक गए, भूख ने उन्हें लाचार ज़रूर कर दिया था पर वो बिना प्रेम की इजाज़त के पत्थर की मूरत बन कर खड़े थे। जब प्रेम ने उन्हें बैठने के लिए कहा तो वो दोनों अपना बोरा टेबल के नीचे सरका कर बैठ गए।

उसने बच्चों से पुछा कि क्या खाओगे तो लड़के ने बिना कुछ कहे उसकी प्लेट कि तरफ इशारा कर दिया। प्रेम ने तुरंत एक चिकन करी और रोटी मंगवाई। खाना आते ही लड़का उसे खाने के लिए हाथ बढ़ाने लगा तो उसकी बहन ने रोका और हाथ धुलने के लिए कहा, यह देख कर प्रेम को उस बच्ची पर बहुत प्रेम आया, विद्यालय का चेहरा भी नहीं देखने वाले बच्चे इतने सभ्य थे।

यह दृश्य वहाँ मौजूद सभी लोग ऐसे देख रहे थे जैसे कोई जादूगर कोई खेल या तमाशा दिखा रहा हो। सब शांत थे और शायद शर्मिंदा भी। प्रेम अपने विचारों और उन लोगों की प्रतिक्रिया देखने में व्यस्त था और इधर उन दोनों बच्चों ने अपना खाना खत्म कर दिया था। वो खाना खा कर और प्रेम का धन्यवाद करके चले गए और उनके साथ उसकी भूख भी चली गई थी। उसकी आत्मा शांत थी और मन तृप्त, उसने किसी तरह एक दो निवाला भूख के नाम पर खाया और हाथ धोने चला गया।

हाथ धो कर जब वो वापस आया तो बिल देख कर प्रेम आश्चर्यचकित रह गया था, उसकी आँखों के किनारे पर आँसू का एक क़तरा तैर कर आ गया था। प्रेम ने बिल हाथ में लिया, काउंटर पर बैठे व्यक्ति को देखा। दोनों की आँखें मिलीं और दोनों एक दूसरे को देख कर मुस्कुरा रहे थे। वही क्षण था जब प्रेम को एहसास हुआ कि ज़िंदगी बस अपनी कंपनी के वार्षिक सम्मलेन में हिस्सा लेने भर का नाम नहीं थी। उसे एहसास हो गया था कि वह कोई मशीन नहीं बल्कि एक इंसान है जो किसी भूखे बच्चे को देख कर तड़पता है, ज़िंदगी की भाग-दौड़ ने भले उसको मशीन बना दिया था पर इस एक पल ने उसे वापस इंसान बन दिया था। काउंटर पर बैठे व्यक्ति की मुस्कुराहट ने उसे बता दिया था कि दुनिया में अब भी भलाई का बदला भलाई ही है, नेकी का बदला नेकी ही है। लोग कितना भी कहें कि समाज बुरा बन चूका है पर इसी बुरे समाज में अच्छे लोग भी हैं।

प्रेम को रेस्टोरेंट में जो बिल मिली थी उस पर लिखा था, “हमारे पास ऐसी कोई मशीन नहीं है जो भलाई और इंसानियत का शुल्क लिख सके।”


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