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मेरी कहानी: एक वक़्त था जब मैं बस स्टॉप पर सोता था और सड़कों पर बने स्नानगृह में नहा कर इंटरव्यू देने जाता था

ashu

October 14, 2016

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मध्यप्रदेश के जबलपुर शहर में मेरे पिता एक स्क्रीन प्रिंटिंग कंपनी चलाते थे। एक आम परिवार की तरह हमारा जीवन भी सकुशल गुज़र रहा था, परंतु कुछ ही समय में हमारी आर्थिक स्थिति धीरे-धीरे ख़राब होने लगी और हम निर्धन हो गए। घर के हालात बदलने का नाम ही नहीं ले रहे थे। कुछ वर्षों तक, मैं अपने दादा जी के साथ दुकान में बैठकर काम में उनका हाथ बटाने लगा। दादाजी मुझे प्रतिदिन काम करने के 5 रुपये देते थे। वह 5 रुपये मेरे लिए उतने ही अनमोल थे जितना एक भूखे के लिये भोजन का एक निवाला। जैसे बूँद-बूँद से घड़ा भरता है, उसी तरह मैंने अपनी पढ़ाई के लिए पैसे जमा करना शुरु कर दिया।

मेरा बचपन से सपना था- एक आईटी एक्सपर्ट बनने का। परंतु मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति और परिस्थितियाँ इतनी अनुकूल ना थीं। मुझसे अपने परिवार की ऐसी हालत देखी नहीं गई और मैंने एक रात अपने आप से यह वादा किया कि चाहे जो भी हो, मैं मुम्बई जाऊंगा। साल २००५ में, मैं अपनी जेब में 1200 रुपये और अपनी आँखों में कई सपने लेकर घर से निकल पड़ा। उस समय मेरी उम्र मात्र 19 वर्ष थी।

मुम्बई पहुँचते ही यह ज्ञात हो गया था कि आने वाला वक़्त आसान नहीं होगा। शुरुआत के 18 दिन बडी़ कठिनाई से गुज़रे। मैंने मुम्बई की सड़कों पर ही अपना आवास खोज लिया था। जे.डब्लू मैरिअट का बस स्टॉप मेरा शयनकक्ष था, पानी में डूबा हुआ बिस्कुट मेरा भोजन और लोकल बाथरूम मेरा स्नानगृह, जहाँ मैं अक्सर इंटरव्यू में जाने से पहले नहाता था। मैंने हर एक बड़े कॉल सेंटर का दरवाजा खटखटाया, पर अंग्रेजी भाषा में कमजोर होने के कारण किसी ने भी मुझे मौका नहीं दिया। पर कहते हैं ना, कोशिश करने वालों के लिए अवसरों की कमी नहीं होती है। देर से ही सही पर मुझे अँधेरी में एक कॉल सेंटर में 1600 रुपये प्रति माह की नौकरी मिल गयी। उस समय मेरे लिए 1600 रुपये ईश्वर के समान थे, इतने रुपये तो मैंने अपने जीवन में देखे ही नहीं थे।

नौकरी मिलने के उपरांत, मैं पांच लोगों के साथ एक छोटे से शेयरिंग कमरे में शिफ्ट हो गया और दिन रात काम करने लगा। कंप्यूटर टाइपिंग ना आने की वजह से, एक संदेश लिखने में मुझे घंटों लग जाते थे। मेरी टाइपिंग गति देखकर, सब मेरे ऊपर हँसते थे, परन्तु उनकी उपहासपूर्ण हँसी मुझे रोक ना सकी। मैं संदेश लिखने का अभ्यास नियमित रूप से करता रहा। 21 दिन में अंग्रेजी सीखने वाले कोर्स में मैंने दाखिला लिया और रात-रात भर जागकर अख़बार का एक-एक शब्द पढ़ने लगा। अख़बार अक्सर मैं अपने ऑफिस से ले आता था।

तीन महीने के उपरांत, मैंने कंप्यूटर टाइपिंग और ठीक-ठाक अंग्रेजी बोलना सीख लिया था। बस फिर क्या था, मुझे एक दूसरे कॉल सेंटर में 8000 रूपए प्रति माह की नौकरी मिली। कंप्यूटर सीखने में मेरी रूचि इतनी ज्यादा थी कि मैंने कंप्यूटर के हार्डवेयर और सॉफ्टवेर समझने के लिए रात दिन एक कर दिए। कुछ ही समय में, मुझे कंप्यूटर की इतनी जानकारी हो गई, जितनी पूरी आईटी डिपार्टमेंट में किसी को ना थी। अगर कोशिश की जाये तो इंसान क्या नहीं सीख सकता।

वर्ष 2007 में, मुझे माइक्रोसॉफ्ट के सर्विस डिपार्टमेंट में नौकरी मिली। इसी साल, मैं अपने परिवार से मिलने वापस गया, पर खाली हाथ नहीं। मेरी आँखों में सच हो चुके सपनों की चमक और जेब में बहुत सारे पैसे थे। घर पहुँचते ही, मैंने पिता जी के ऑफिस का नवीनीकरण कराया, घर में टी.वी. लगवाया, अपनी माँ के लिए एक वाशिंग मशीन और अपने भाइयों के लिए कंप्यूटर खरीदा। 4 दिन के बाद मैं घर से वापस बॉम्बे आ गया, इस बार दिल में परिवार का स्नेह था जो मुझे प्रोत्साहित करने के लिए काफी था।

सही कहते हैं, अगर संकल्प में दृढता हो तो सपने हकीकत में ज़रूर बदलते हैं। कुछ महीने बाद मैंने अपनी नौकरी छोड़ दी और अपनी खुद की एक कंपनी प्रारंभ की। उस वक़्त मेरी कंपनी में एक ही कर्मचारी था। हमारे पहले ग्राहक ने हमसे एक वेबसाइट बनाने का आग्रह किया और उसके बदले में हमें 15,000 रुपये दिए। वो दिन था और आज का दिन है, मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। अब तक मैं अनगिनत वेबसाइट, आई.ओ.एस एप्स और सैकड़ों कंप्यूटर की सर्विसिंग कर चुका हूँ। मज़े की बात यह है कि अंग्रेजी ना आने पर जिस व्यक्ति ने मेरा मजाक बनाया था, वह आज मेरी ही कंपनी में एक कर्मचारी है।

फुटपाथ में खाली पेट और परिवार की यादों में गुज़ारी हुई रातों ने मुझे जितना मज़बूत बनाया, उतना किसी ने नहीं। बुरा वक़्त इंसान को कितना ही मुश्किल क्यों न लगे पर वही वक़्त उसे उसके सपनों के करीब ले जाता है। किसी ने सत्य ही कहा है कि वक़्त जैसा भी हो, बदलता ज़रूर है। भले ही यहाँ तक पहुँचने में मुझे अधिक संघर्ष करना पड़ा है, परंतु सच तो यही है कि परिणाम उम्मीद से बहुत ज़्यादा और अच्छा मिला है।”


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