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मेरी कहानी: कुछ देर बाद उसने अपने आंसू पोंछकर मुझे कुछ ऐसा बताया कि मैं सन्न रह गई, मेरे पैरों से मानो ज़मीन खिसक गई

ashu

October 14, 2016

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मुझे याद है, तब मैं ऑफिस में काम कर रही थी, एक आदमी अपने बच्चे के साथ ऑफिस में आया, उसे कुछ शेयर्स की वैल्यू जाननी थी। उसके साथ एक छोटा बच्चा भी था, जो पूरी ऑफिस में दौड़भाग कर रहा था। कभी इस चेयर पर बैठता तो कभी दूसरी पर, कभी पेपर उड़ाता तो कभी कोई सामान उठा लेता। वो आदमी उसे रोकने की बहुत कोशिश कर रहा था, पर बच्चे कहाँ किसी की सुनते हैं।

कुछ देर बाद वो बच्चा उठकर मेरे पास आ गया और कंप्यूटर पर गेम खेलने की ज़िद करने लगा, मैंने सोचा शायद वो इससे बहल जाए। मैं उससे सवाल करने लगी और वो मेरे हर सवाल का जवाब देता, मैंने पूछा कि वो स्कूल जाता है तो उसने हाँ में जवाब दिया। मैं उसका नाम, इत्यादि पूछती रही और तब तक वो आदमी आ गया। वो बच्चे की शरारतों के लिए माफ़ी माँग रहा था, मैंने उससे कहा कि इसकी कोई आवश्यकता नहीं है, बच्चे अगर शरारत नहीं करेंगे तो कौन करेगा। उसने मेरा धन्यवाद किया और बच्चे को साथ लेकर ऑफिस से बाहर चला गया।

कुछ दिन बाद वही आदमी दुबारा ऑफिस आया, इस बार वो अकेला था और बहुत परेशान लग रहा था, मैंने उससे बच्चे को साथ ना लाने की वजह पूछी तो वो फूट फूटकर रोने लगा। मैं एक दम घबरा गई कि कहीं मैंने कुछ गलत तो नहीं कर दिया, मैंने उसके लिए पानी मंगवाया और उसे शांत करने की कोशिश की। कुछ देर बाद उसने अपने आंसू पोंछकर मुझे कुछ ऐसा बताया कि मैं सन्न रह गई, मेरे पैरों से मानो ज़मीन खिसक गई। उसने रोते-रोते बोला कि अब उसका छोटा सा बेटा इस दुनिया में नहीं रहा, उस मासूम शरारती बच्चे का चेहरा मेरी आँखों के सामने नाच गया। मैंने हिम्मत कर के आगे पूछा तो उसने बताया कि उसको 1 हफ़्ते से बहुत तेज़ बुखार था और वो…इसके बाद वो कुछ बोल नहीं पाया और रोने लगा।

उसने बताया कि वो 1 महीने से ऑफिस नहीं गया था और उसके घर पर पैसे की तंगी थी, इसलिए उसने जो पैसे शेयर में लगाए थे, वो उन्हें वापस लेने आया था। उसकी पत्नी की हालत भी ठीक नहीं थी, वो गहरे सदमें में थी, अचानक अपनी कहानी बताते हुए उसने ऐसा कुछ कहा कि मैं घबरा गई। वो आत्महत्या करने की बातें करने लगा, बेटे की कमी ने उसको आधा कर दिया था उर अब वो जीना नहीं चाहता था। मैं उसको समझाने का पूरा प्रयास करती रही, मैं समझ नहीं पा रही थी कि मैं उसे कैसे समझाऊं।

मैं जानती थी कि उसके साथ जो हुआ वो बहुत दुखद था, मेरी बातें उसे भाषण जैसी लगतीं पर मैं उससे बातें करती रही। बातों से ही मुझे पता चला कि उसकी एक बेटी भी है, मैंने उससे उसकी बेटी के लिए जीने के लिए कहा, उसकी पत्नी के लिए जीने के लिये कहा। मैंने उसको समझते हुए कहा कि अगर वो काम पर नहीं जाएगा तो उसके परिवार का क्या होगा, उसका बेटा तो वापस नहीं आ सकता पर अगर वो ऐसे हताश और निराश रहेगा तो उसका परिवार टूटकर बिखर जाएगा। वो मेरी बातें गौर से सुनता रहा और फिर अचानक वो उठकर चला गया, उसके जाने के बाद मैं अपनी डेस्क पर बैठकर घंटों उसके बारे में सोचती रही, मेरे मन में उसकी बातें गूंजती रहीं।

करीब 6 महीने बाद वो आदमी एक दिन फिर ऑफिस आया, सिर्फ़ मुझसे मिलने के लिए। मैं उसे देखकर खुश थी, वो मुस्कुराकर मेरे पास आया और मेरा शुक्रिया अदा करने लगा। उसने मुझे बताया कि अगर मैं उस दिन उसको समझाती नहीं तो शायद वो आत्महत्या कर लेता, वो बार बार यही कहता रहा कि मैंने उसको नई ज़िंदगी दी थी, उसके परिवार को नई ज़िंदगी दी थी। इन 6 महीनों में वो बदल चुका था, अपने बेटे को खो देने के सदमे से बाहर आ चुका था और अब वो ज़िंदगी में आगे बढ़ चुका था।

मैं ये कहानी यहाँ पर सिर्फ़ इसलिए बाँट रही हूँ क्योंकि आज कल की भागदौड़ की ज़िंदगी में समय हम में से किसी के पास भी नहीं है। हर व्यक्ति अकेला होता जा रहा है, बस अपने अंदर ही पता नहीं कितनी परेशानियों में उलझा रहता है, इसलिए अगर कोई भी आपको परेशान दिख रहा हो तो उससे बात करने की कोशिश ज़रूर कीजिये। पता नहीं डिप्रेशन में वो कौन सा कदम उठा ले, चाहे आपकी बातें उसे समझ आ रही हों या नहीं, पता नहीं आपकी कौन सी बात उसके मन में बैठ जाए। हम हर परेशानी से बाहर आ सकते हैं, शर्त ये है कि हम उसके बारे में किसी से बात करें।

-प्रियंका रितेश श्रीवास्तव द्वारा भेजी गई।


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