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प्रीति ने उठाया जरूरी मुद्दा, क्या उबर लाएगी बदलाव?

Poonam

July 22, 2017

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कहीं जाने से पहले मुझे 50,000 बार सोचना पड़ता है, बसों के रैंप खराब हैं, ट्रेन के अंदर जाने की कोई सुविधा नहीं है, लिफ्ट तो बने हैं लेकिन उससे पहले चार सिढियां हैं जिसे पार करना ही एक बड़ी चुनौती है.”

तर्कसंगत से बात करते हुए प्रीति ने ऐसी कई बातें की जिनका बदलना बहुत जरुरी है.

दिल्ली की रहने वाली प्रिती आज खबरों में हैं क्योंकि उन्होंने दिव्यांगों का एक बेहद ज़रूरी मुद्दा उठाया है.प्रीति ने फ़ेसबुक पर कैब कंपनी उबर के नाम एक ख़त लिखा है जो अब वायरल हो गया है.अपने खत में प्रीति ने उस भेदभाव का ज़िक्र किया है जिसका सामना हर रोज़ दिव्यांगों को करना पड़ता है.

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1604993842845576&id=100000049269089

प्रीति का कहना है कि उबर के दोनो ड्राईवर इस बात से नाखुश थे कि उन्हें उनकी व्हील चेयर को गाड़ी में रखना पड़ेगा. वो जब अपनी व्हीलचेयर लेकर कैब में सवार हुईं तो कैब चालक ने उनसे कहा कि मेरी गाड़ी गंदी हो जाएगी और सफर के दौरान कई दफा ये बात दोरहाई गई.प्रीति का कहना है कि ड्राइवर के ऐसे व्यवहार अपमानजनक था.सफर पूरा होने पर उन्होंने अपने भाई से गाड़ी की सीट को साफ करवाया क्यूंकि वो नहीं चाहती थी की किसी और के साथ ड्राईवर इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करे.

जब उन्होंने उबर के अधिकारियों को इस मामले की जानकारी दी तो उनका एक ही जवाब आया किहम जाँच करेंगे

प्रीति कहती हैं कि समाज में कुछ ऐसे लोग हैं जिनकी संवेदनाएं मर चुकी हैं.

ये अपने आप में पहला मामला नहीं है क्योंकि ऐसी कई घटनाएं हैं जो हो चुकी हैं और लगातार हो रही हैं. श्रीराम कॉलेज ऑफकॉमर्स से ग्रेजुएटप्रीति कहती हैं कि ऐसा उनके साथ पहली बार नहीं हुआ है ज्यादातर ड्राईवर व्हीलचेयर को सीट पर रखने के लिए तैयार नहीं होते है. कारों में लगेज कैरियर नहीं होता औऱ बूट स्पेस इतनी नहीं होती की व्हील चेयर रखा जा सके.

वो कहती हैं कि अगर टैक्सी की बात छोड़ भी दें तो बसों के रैंप खराब हैं, ट्रेन के अंदर जाने की कोई सुविधा नहीं है, लिफ्ट तो बने हैं लेकिन उससे पहले चार सिढियां हैं जिसे पार करना ही एक बड़ी चुनौती है. भारत में ऐक्सेसिबिलिटी एक बड़ी समस्या है.यहाँ ज़्यादातर सरकारी दफ़्तरों की इमारतों में भी दिव्यांगों के लिये मूलभूत सुविधाएँ  नहीं हैं.

तर्कसंगत से खास बातचीत में प्रीति कहती हैं की ऐसे मुद्दों पर सिर्फ़ बातें होती हैं लेकिन कोई एक्शन नहीं लिया जाता.

दिव्यांगो के मसले पर संवेदनशीलता बनाये जाने की बहुत ज़रूरत है. वो बचपन से ऐसी समस्याओं का सामना कर रहीं हैं लेकिन आजतक उनको कोई बदलाव नहीं दिखा. जब देश कि राजधानी दिल्ली का यह हाल है तो दूसरे शहरों का क्या होगा आप समझ सकते हैं. वह कहती हैं कि हमेशा से वो ऐसी समस्याओं पर आवाज़ उठाती आयी हैं और आगे भी उठायेंगी. अगर उनको उबर की तरफ़ से संतोषजनक जवाब नहीं मिलता तब वह क़ानूनी करवाई भी कर सकती हैं.

अभी कुछ दिन पहले  अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश का गौरव बढ़ाने वाली पैरा एथलीट स्वर्णा का भी मामला सामने आया था जब इस दिव्यांग एथलीट को ट्रेन में अपर बर्थ पर सोने के लिए मजबूर किया गया, जबकि वास्तव में सुर्वणा व्हील चेयर से भी नहीं उठ सकतीं.

ऐसे में अपर बर्थ तक पहुंचना उनके लिए असंभव बात है. सरकारी सिस्टम के उत्पीड़न का शिकार सुर्वणा ने रेल मंत्री सुरेश प्रभु को टवीट करके इस मामले की जानकारी भी दी थी.

प्रीति कहती हैं, “सार्वजनिक स्थलों और सरकारी संस्थाओं में दिव्यांगों की सुविधाओं को लेकर सरकार भले ही बड़ेबड़े दावे करती हो, लेकिन सच्चाई इससे कोसो दूर है. यही नही दिव्यांगों के लेकर आम लोगों को भी अपनी सोच बदलने की जरुरत है क्योंकि वो भी समाज का एक सशक्त और अभिन्न हिस्सा हैं.”


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