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रक्षाबंधन आज, जाने राखी बांधने का शुभ मुहूर्त और कथा.

तर्कसंगत

August 7, 2017

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रक्षाबंधन का प्रचलन सदियों पुराना बताया गया है. इसका उल्लेख हमारी पौराणिक कथाओं व महाभारत में मिलता है और इसके अतिरिक्त इसकी ऐतिहासिक व साहित्यिक महत्ता भी उल्लेखनीय है.

रक्षाबंधन का इतिहास काफी पुराना है, जो सिंधु घाटी की सभ्यता से भी जुड़ा हुआ है. असल में रक्षाबंधन की परंपरा उन बहनों ने डाली थी जो सगी नहीं थीं, भले ही उन बहनों ने अपने संरक्षण के लिए ही इस पर्व की शुरुआत क्यों न की हो, लेकिन उसकी बदौलत आज भी इस त्योहार की मान्यता बरकरार है.

इस बार रक्षाबंधन पर एक खास संयोग बन रहा है जो सभी भाईबहनों के लिए बेहद खास है. 12 साल बाद एक बार फिर चंद्रग्रहण और रक्षाबंधन एक दिन पड़ेगा. आज राखी के दिन ही पहले भद्रा का असर रहेगा और बाद में सूतक लग जाएगा. दोनों अवस्थाओं में कोई भी शुभकार्य नहीं किया जाता. ऐसे में बहनें भद्रा और सूतक के बीच में भाइयों को राखी बांध सकती हैं. इस तरह रक्षाबंधन मनाने का शुभ मुहूर्त 11.05 बजे से दोपहर 1.53 बजे तक ही है.

रक्षाबंधन से जुड़ी पौराणिक कथा

एक सौ यज्ञ पूर्ण कर लेने पर दानवेन्द्र राजा बलि के मन में स्वर्ग का प्राप्ति की इच्छा बलवती हो गई तो का सिंहासन डोलने लगा. इन्द्र आदि देवताओं ने भगवान विष्णु से रक्षा की प्रार्थना की.

भगवान ने वामन अवतार लेकर ब्राह्मण का वेष धारण कर लिया और राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुँच गए. उन्होंने बलि से तीन पग भूमि भिक्षा में मांग ली. बलि के गुरू शुक्रदेव ने ब्राह्मण रुप धारण किए हुए विष्णु को पहचान लिया और बलि को इस बारे में सावधान कर दिया किंतु दानवेन्द्र राजा बलि अपने वचन से न फिरे और तीन पग भूमि दान कर दी.

वामन रूप में भगवान ने एक पग में स्वर्ग और दूसरे पग में पृथ्वी को नाप लिया. तीसरा पैर कहाँ रखें? बलि के सामने संकट उत्पन्न हो गया. यदि वह अपना वचन नहीं निभाता तो अधर्म होता. आखिरकार उसने अपना सिर भगवान के आगे कर दिया और कहा तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख दीजिए. वामन भगवान ने वैसा ही किया. पैर रखते ही वह रसातल लोक में पहुँच गया.

जब बलि रसातल में चला गया तब बलि ने अपनी भक्ति के बल से भगवान को रातदिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया और भगवान विष्णु को उनका द्वारपाल बनना पड़ा. भगवान के रसातल निवास से परेशान लक्ष्मी जी ने सोचा कि यदि स्वामी रसातल में द्वारपाल बन कर निवास करेंगे तो बैकुंठ लोक का क्या होगा?

इस समस्या के समाधान के लिए लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय सुझाया. लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे रक्षाबन्धन बांधकर अपना भाई बनाया और उपहार स्वरुप अपने पति भगवान विष्णु को अपने साथ ले आयीं. उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी यथा रक्षाबंधन मनाया जाने लगा.

भविष्य पुराण के अनुसार

रक्षा विधान के समय निम्न लिखित मंत्रोच्चार किया गया था जिसका आज भी विधिवत पालन किया जाता है:

येन बद्धोबली राजा दानवेन्द्रो महाबल:

दानवेन्द्रो मा चल मा चल ।।

इस मंत्र का भावार्थ है कि दानवों के महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे, उसी से तुम्हें बांधता हूँ. हे रक्षे! (रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो. यह रक्षा विधान श्रवण मास की पूर्णिमा को प्रातः काल संपन्न किया गया यथा रक्षाबंधन अस्तित्व में आया और श्रवण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने लगा.

राखी एक धर्मनिरपेक्ष त्योहार है.

इसके कई साक्ष्य इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं. रक्षाबंधन की शुरुआत का सबसे पहला साक्ष्य रानी कर्णावती और सम्राट हुमायूं का है. मध्यकालीन युग में राजपूत और मुस्लिमों के बीच संघर्ष चल रहा था, तब चित्तौड़ के राजा की विधवा रानी कर्णावती ने गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह से अपनी और अपनी प्रजा की सुरक्षा का कोई रास्ता न निकलता देख हुमायूं को राखी भेजी थी. तब हुमायू ने उनकी रक्षा कर उन्हें बहन का दर्जा दिया था.


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