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क्या मुंबई से आई इन दो ख़बरों ने आपको भी झकझोरा?

तर्कसंगत

August 10, 2017

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इस सप्ताह भारत की ओद्योगिक राजधानी मुंबई से दो कहानियां आईं हैं.

अमरीका में रह रहा एक बेटा लंबे अंतराल के बाद मुंबई लौटा और उसे घर में मां का कंकाल मिला.

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक मां एकांत में भूख से मर गई और कई महीनों तक किसी को ख़बर नहीं लगी.

दूसरी ख़बर मशहूर उद्योगपति विजयपत सिंघानिया की है. भारत के चर्चित रेमंड समूह के मालिक रहे सिंघानिया को उनके बेटे ने पाई पाई के लिए मोहताज कर दिया है.

सिंघानिया ने अपने वकील के ज़रिए अदालत में बताया है कि उनके बेटे गौतम सिंघानिया ने उन्हें पैसे देने बंद कर दिए है.

78 वर्षीय सिंघानिया ने हज़ारों करोड़ का कारोबार खड़ा किया और अपने बेटे के नाम कर दिया.

लेकिन अब बुढ़ापे में उनके पाई-पाई से मोहताज होने की ख़बर सुर्खी बनी है.

बहुत मुमकिन है कि जैसा मीडिया रिपोर्टें बता रही हैं उतने बुरे हाल में सिंघानिया न रह रहे हों लेकिन मुंबई से आईं ये दोनें ख़बरें न सिर्फ़ हमारे समाज पर सवाल उठाती हैं बल्कि उसे भीतर तक झकझोरती भी हैं.

सोशल मीडिया पर इन ख़बरों को साझा करते हुए लोग नए भारत के सामाजिक मूल्यों पर सवाल उठा रहे हैं.

लोग पूछ रहे हैं कि क्या पैसा की भूख इतनी ज़्यादा हो गई है कि बूढ़े माता पिता का कोई महत्व नहीं रह गया है.

जबकि कुछ लोगों का यह तर्क भी है कि ऐसे पैसे का क्या फ़ायदा जब अपने माता-पिता ही इस तरह तड़पने को मजबूर हों.

ये दोनों ख़बरें हमारे समाज की एक बेहद कड़वी सच्चाई की एक बेहद कड़वी सच्चाई सामने रखती हैं.

हाल ही में एक और रिपोर्ट आई थी जिसमें बताया गया था कि भारत के महानगरों में बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार बढ़ रहा है.

ज़रा ठहरिए और सोचिए कि जब आपकी सोशल मीडिया फ़ीड में ये ख़बरें आईं तो आपने क्या किया?

क्या आप ठहरे और आपने सोचा कि हमारा समाज ग़लत दिशा में जा रहा है या आप आगे बढ़ गए.

यदि आप इन ख़बरों पर बिना ठहरे, बिना कुछ सोचे स्क्राल करके आगे बढ़ गए तो मान लीजिए कि वाकई में हमारा समाज हमारे अपने बुज़ुर्गों के प्रति असंवेदनशील हो गया है.

वैसे हममें से बहुत से लोगों ने अपने सोशल मीडिया पर इन ख़बरों पर गुस्सा और अफ़सोस जाहिर किया है.

लेकिन दुख की बात ये है कि ये गुस्सा और अफ़सोस भी सिर्फ़ सोशल मीडिया तक ही है.

दूसरों के घर के मामला है तो हम हाय-हाय कर रहे हैं, भले ही अपने घर के किसी कोने में रह रहे अपने बुज़ुर्गों से हमें हालचाल पूछे महीने हो गए हों.


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