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शर्मनाक : केरल के स्कूल में छात्रों के एजुकेशन स्किल्स को देखते हुए दो अलग-अलग यूनिफार्म

तर्कसंगत

August 13, 2017

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“बाहर एक बेरहम कंपटीटिव दुनिया बसी हुई है और इस दुनिया में सभी को अपने अपने घरो में टॉपर्स और रैंकर्स उगाने हैं ” तारे ज़मीन पर मूवी का यह डायलॉग मुझे केरल से आई उस शर्मनाक खबर पर याद आया जिसमें मल्लापुरम के एक स्कूल ने छात्रों के एजुकेशन स्किल्स (शैक्षिक कौशल) को देखते हुए उनकी स्कूल यूनिफार्म का बटवारा कर दिया है.

मीडिया में आई खबरों के मुताबिक केरल के जिला मल्लापुरम में अल फ़ारूख़ अंग्रेजी माध्यम स्कूल ने छात्रों के कौशल को देखते हुए दो अलग-अलग यूनिफार्म लागू की हैं.

स्कूल के अनुसार, यह नई अनूठी प्रणाली छात्रों को अपने प्रदर्शन में सुधार करने में मदद करेगी और पुरे वर्ष उनको परिक्षाओं में अच्छी ग्रेड लाने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा.

शैक्षिक कौशल में तेज छात्रों को सफेद शर्ट और टॉप दिए गए हैं, औसत और खराब प्रदर्शन वाले छात्रों को लाल चेक शर्ट और टॉप पहनने के निर्देश दिए गए हैं.

सभी छात्रों को सलाह दी गई है कि वे नए अकादमिक सत्र में जून में शुरू किए गए इसी ड्रैस कोड का पालन करें.

स्कूल के अनुसार स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के लिए ये फैसला लिया गया लेकिन कई माता-पिता ने इसे भेदभावपूर्ण पाया और इसका विरोध किया.

असल में स्कूल का ये फैसला बेहद शर्मनाक है.

स्कूलों में ‘यूनिफार्म’ की अवधारणा एकरूपता को बढ़ावा देने के लिए होती है. किसी भी छात्र के साथ ऐसा करना उसके आत्मविश्वास को नष्ट करना है.

साथ ही उसे दिमागी रूप से कष्ट पहुंचना है.

क्या शैक्षिक कौशल या मार्कशीट में अच्छे नंबर ही हर चीज़ का मापदंड है ? छात्रों पर किताबो का बोझ न डालते हुए उनको उनका रचनात्मक पक्ष तलाशने दें.

उनको इतनी आज़ादी दे की वो खुल कर अपने आने वाले कल का चयन कर सकें.

अगर नंबर लाना ही सबकुछ होता तो दुनिया में सिर्फ़ टॉपर ही रहते.

सभी छात्रों की अपनी अलग-अलग क्षमताएं होती हैं, ऐसे में कम नंबर वाले छात्रों को अलग तरह की ड्रैस पहनकर अपमानित करना समाज के ख़िलाफ़ एक अपराध भी है.

इससे छात्रों में अवसाद की भावना भी बढ़ सकती है. स्कूलों में छात्रों के बीच चली आ रही बराबरी की भावना को बचाने के लिए अब लगता है कि प्रशासनिक दख़ल की ज़रूरत है.


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