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बाबा राम रहीम पर फ़ैसला और व्यवस्था पर गंभीर सवाल

तर्कसंगत

August 24, 2017

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पंचकुला की एक विशेष सीबीआई अदालत को बाबा राम रहीम पर चल रहे बलात्कार के एक मुक़दमे में कल यानी शुक्रवार 25 अगस्त 2017 को फ़ैसला सुनाना है.
लेकिन अदालत के फ़ैसले से पहले बाबा राम रहीम के लाखों समर्थक चंडीगढ़ और उसके आसपास इकट्ठा हो रहे हैं.
हालात ऐसे हो गए हैं कि पंजाब सरकार को चंडीगढ़ के अपने सभी कार्यालयों में सरकारी छुट्टी घोषित करनी पड़ी है.
हरयाणा सरकार ने पहले से ही दो दिनों की छुट्टी घोषित कर रखी है.
प्रशासन ने 72 घंटों के लिए पंजाब, हरयाणा और चंडीगढ़ में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी हैं.
यही नहीं उत्तर रेलवे ने 24 अगस्त को पंजाब के लिए छह और 25 अगस्त को 22 ट्रेनें रद्द कर दी हैं.
पंजाब और हरियाणा के कई ज़िलों में सार्वजनिक यातायात सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं.
हालात इतने तनावपूर्ण हो गए हैं कि प्रदेश सरकारों को केंद्र से अर्धसैनिक बलों की मांग करनी पड़ी है.
बाबा राम रहीम के लाखों अनुयायियों और समर्थकों के अदालत परिसर के पास इकट्ठा होने को लेकर अदालत ने स्थानीय प्रशासन की फटकार भी लगाई है.
एक धर्मगुरू पर बलात्कार का मामला और उसके फ़ैसले के दिन इस तरह के हालात भारतीय समाज के बारे में बहुत कुछ कहते हैं.
लेकिन साथ ही ये सवाल भी उठता है कि क्या ऐसे हालातों में न्यायाधीशों पर दबाव नहीं होगा?
और यदि दबाव होगा तो फिर क्या लोगों को इस तरह से अदालती फ़ैसलों को प्रभावित करने की अनुमति दी जा सकती है?
बाबा राम रहीम पर बलात्कार के मुक़दमे में आ रहा ये फ़ैसला अदालत और स्थानीय प्रशासन के लिए भी परीक्षा की घड़ी बन गया है.
ये सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या धर्मगुरुओं को इस तरह आम जनजीवन को प्रभावित करने की इजाज़त दी जानी चाहिए?
पंजाब और हरयाणा में जो अघोषित हड़ताल जैसा माहौल बना है उससे होने वाले नुक़सान की भरपाई कौन करेगा?
इंटरनेट और आम सेवाओं की वजह से आम जनजीवन पर जो असर पड़ेगा उसकी ज़िम्मेदारी कौन लेगा?
क्या ये समय नहीं आ गया है जब समाज में धर्मगुरूओं की भूमिका पर चर्चा होनी चाहिए?

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