मेरी कहानी

जब मैं मंत्रियों को पत्र लिख रहा तब मैं सिर्फ़ ये जानता था कि मुझे कैसे भी डॉक्टर बनना है

Poonam

September 5, 2017

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डॉ. आडवाणी भारत के सबसे चर्चित कैंसर विशेषज्ञों में से एक हैं. 8 साल की उम्र में डॉ. आडवाणी पोलियो से पीड़ित हो गए थे और तब से ही व्हीलचेयर पर हैं. लेकिन कोई भी मुश्किल उन्हें डॉक्टर बनने से नहीं रोक सकी.

1974 के बाद से डॉ. आडवाणी मेडिकल ऑन्कोलॉजी/हेमोटोलॉजी के क्षेत्र में सक्रिय हैं और चिकित्सा और विज्ञान के अन्य क्षेत्रों से भी उनका संबंध रहा है.

डॉ. आडवाणी उस दौर को भी याद करते हैं जब उन्हें मुंबई के ग्रांट अस्पताल में एमबीबीएस के अंतिम वर्ष के छात्रों के लिए सुपरवाइज़ल क्लिनिकल ट्रेंनर की नौकरी भी नहीं दी गई थी.

वो साठ के दशक का दौर था. उस समय मेडिकल कॉलेज में छह विभाग थे और पांच ने उन्हें नौकरी देने से मना कर दिया था क्योंकि वो विकलांग थे.

सभी मुश्किलों का सामना करते हुए आडवाणी ने किसी तरह एमडी की डिग्री हासिल की. लेकिन वो यहीं नहीं रुके बल्कि चिकित्सा के क्षेत्र में उनका सफर यहां से शुरू हुआ.

मंत्रियों के नाम पत्र

डॉ. आडवाणी न सिर्फ़ कैंसर विशेषज्ञ के रूप में पहचान हासिल की बल्कि भारत सरकार ने उनकी सेवाओं के लिए उन्हें पदम विभूषण देकर सम्मानित भी किया.

जब उन्होंने ग्रांट मेडिकल कॉलेज में दाख़िले के लिए आवेदन किया था तब भी उन्हें विकलांग होने की वजह से सीट नहीं दी गई थी. डॉ. आडवाणी ने मंत्रियों, अधिकारियों और अस्पताल प्रशासन को पत्र लिखा और अंततः उन्हें दाख़िला दे दिया गया.

वो अपने हौसले और टेलेंट के दम पर कॉलेज के डीन को दाख़िला देने के लिए मनाने में कामयाब रहे थे.भारत में लेकेमिया के मरीज़ों में बोन मैरो ट्रांसप्लांट के क्षेत्र में डॉ. आडवाणी ने महारथ हासिल की है.

पोलियो से ग्रसित होने से पहले तक डॉ. आडवाणी की कोई बड़ी महत्वाकांक्षा नहीं थी. 1950 के उस दौर में पोलियो का कोई इलाज भी नहीं था. लेकिन जब उन्होंने मुंबई के अस्पताल में कुछ महीने बिताए तब डॉक्टरों के साथ हुई बातचीत से उन्हें नई रोशनी मिली.

लंदन में प्रशिक्षण

तब ही उन्होंने तय कर लिया था कि वो एक डॉक्टर बनेंगे. मुंबई के ग्रांट मेडिकल कॉलेज से डॉक्टरी की डिग्री लेने के बाद उन्होंने मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल में अपनी सेवाएं दीं.

बोन मैरो ट्रांस्प्लांट और ऑन्कोलॉजी में विशेषज्ञा हासिल करने के लिए वो लंदन के रॉयल मार्सडेन अस्पताल चले गए थे.

उन्होंने भारत में सबसे पहला बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया था. उन्होंने लेकेमिया से पीड़ित एक नौ साल की बच्ची में उसकी मां का बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया था.

उन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में अपनी एक विशेष पहचान बनाई हौ और आज वो हज़ारों मेडिकल छात्रों के लिए आदर्श व्यक्तित्व हैं.

उन्होंने न सिर्फ़ शारीरिक और अन्य चुनौतियों का सामना किया बल्कि अपने क्षेत्र में महारथ भी हासिल की.

डॉ. आडवाणी चिकित्सा के क्षेत्र में आज भी बेहद सक्रिय हैं और कभी कभी जसलोक अस्पताल में सुबह के चार-पांच बजे तक मरीज़ों के इलाज में जुटे रहते हैं.

युवाओं के लिए संदेश

युवाओं के नाम संदेश देते हुए वो कहते हैं कि कोई विकलांगता न आपको रोक सकती है और न ही आपकी पहचान बन सकती है. मैं जसलोक अस्पताल में हज़ारों मरीज़ों से मिलता हूँ लेकिन आजतक किसी ने मेरी व्हीलचेयर की वजह से मेरे बारे में कोई राय नहीं बनाई है. जब में दाख़िले के लिए मंत्रियों को पत्र लिख रहा था तब मुझे एक ही बात पता थी कि मुझे किसी भी क़ीमत पर डॉक्टर बनना है और मानवता की सेवा करनी है. और मैं जब तक डॉकटर बन नहीं गया, मैंने अपनी कोशिशें जारी रखीं.

Story By – Mansi Dhanak


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