मेरी कहानी

मेरी बीवी ने मेरी बांहों में अपनी अंतिम सांसे लीं, बची ज़िंदगी मैं उसकी याद में जीना चाहता हूं

Poonam

September 8, 2017

SHARES

जब मैं अपनी पत्नी ज़रीन से पहली बार मिला था तब मैं बीस साल का था. हम दोनों गुजरात में एक शादी में मिले थे. हमारे परिजन पुराने दोस्त थे और कई साल बाद मिले थे. उन्होंने ही हमारा एक दूसरे से परिचय कराया था.

वो पहली नज़र का प्यार था. मुझे अब भी याद है जब उसने पहली बार अपनी मधुर आवाज़ में मुझसे हैलो कहा था.  हम दोनों दोस्त बन गए. कुछ ही सप्ताह बाद मैंने उसके पिता से उसके साथ समय बिताने की अनुमति मांगी.

मैंने ये स्पष्ट कर दिया था कि मेरा स्नातक की डिग्री हासिल करने से पहले शादी करने का कोई इरादा नहीं है. मैं अपनी इंजीनियरिंग की क्लास छोड़कर उसके कॉलेज के बाहर खड़ा इंतेज़ार किया करता था.

उसके पिता जब उसे कॉलेज छोड़कर चले जाते थे तो हम दूसरी दिशा में निकल जाते. हम खूब घूमते. सिनेमा देखते, कैफे जाते. हम एक दूसरे के साथ बहुत वक़्त बिताते. हमारे परिवार दोस्त थे तो हमारा एक दूसरे के घर भी खूब आना जाना था.

कई बार जब हमारे पिता साथ में बियर पी रहे होते, तब हम एक दूसरे के साथ समय बिताने चुपके से निकल जाते.

जब मैं 24 साल का था तब हमारी शादी हो गई. लेकिन मैं मरीन इंजीनियर था और और मुझे जल्द ही समुद्र के लिए निकलना पड़ता. अगर सच कहूं तो हम दोनों के बीच प्यार का रहस्य ये है कि मैं जब भी लौटता, एक बार फिर से पहली नज़र के प्यार जैसा महसूस होता. हमारे तीन ख़ूबसूरत बच्चे हुए. लेकिन साल 2013 में हमारी ज़िंदगी बदल गई.

ज़रीन को गले का कैंसर हो गया. वो हिम्मत से लड़ी और कैंसर से जीत गई. लेकिन कैंसर 2015 में लौट आया, पहले से अधिक घातक होकर. मैं समुद्र को भूल गया और उसके ही साथ रहा. वो कैंसर से बहुत हिम्मत से लड़ी. 31 रेडियेशन हों या 4 कीमियोथैरेपी, उसने हर बार हिम्मत दिखाई.

लेकिन 2016 में डॉक्टर ने बताया कि कैंसर पूरे बदन में फैल गया है और अब उनके पास जीने के लिए बस तीन महीने ही बचे हैं. अब मेरा मक़सद सिर्फ़ उसे जीवन के तीन सबसे ख़ूबसूरत, सबसे शानदार महीने देना हो गया. मैंने उसके बाद हर पल को उसके साथ जिया. मैंने उसे साफ़ किया, नहलाया, खाना खिलाया, रात को सुलाया. मैं उसका ध्यान रखने में इतना पारंगत हो गया कि कई बार मैं वो काम भी कर देता जो प्रशिक्षित डॉक्टर भी नहीं कर पाते.

11 दिसंबर 2016 को मैंने अपनी ज़रीन को खो दिया. वो आईसीयू में भर्ती थी. उसके अंतिम पलों में सिर्फ़ मैं ही उसके साथ था. हमने एक दूसरे से वादा किया था कि अंतिम पलों में सिर्फ़ हम दोनों होंगे, और कोई नहीं. मुझे लगता है कि उसने वो समय चुना था.

जब वो बहुत बीमार थी तब भी वो अपने हाथ से मुझे छूने की कोशिश करती, उसका हाथ मेरी ओर ऐसे बढ़ता मानों वो मुझे तलाश रही हो.

मेरा बेटा कहता है कि मैं अभी भी एक हाथ बाहर निकालकर सोता हूं. हो सकता है ये बस आदत हो.  उस रात जब वो हमें छोड़कर चली गईं मैं उसके पास ही रहा और बार बार पूछता रहा कि वो मज़ाक तो नहीं कर रही है लेकिन मुझे कोई जवाब नहीं मिला.

ज़रीन के जाने के बाद मैंने अपने जीवन को ऐसे ही जीने का फैसला किया है जैसा कि हम दोनों ने बच्चों के जवान हो जाने के बाद जीने का सोचा था. मैं एक बा फिर से समुद्र में लौट आया हूं, फिर से प्रयोग करना चाहता हूं और जो बचे हुए साल रह गए हैं उन्हें पूरी तरह जीना चाहता हूं.

मैं ठहरकर सकता हूं, अपने 36 सालों के साथ को याद करके रो सकता हूं, लेकिन इससे उसने जो पीड़ा सही वो सब बेकार चली जाएगी. बस उसे याद करके रोते रहना स्वार्थी हो जाने जैसा है. हम दोनों ने जो सपने साथ देखे थे मैं उन्हें अधूरा नहीं छोड़ सकता. मैं अपने जीवन के हर पल को उसकी याद का जश्न मनाते हुए जीना चाहता हूं. मैं चाहता हूं कि वो मुझे ऊपर से देखो और मुस्कुराए. बस यही प्यार है.

“I first met my wife Zarin, when I was 20 years old at a wedding in Gujarat. Our parents were friends, but bumped into…

Nai-post ni Humans of Bombay noong Huwebes, Setyembre 7, 2017

Story By – Humans of Bombay


Contributors

Edited by :

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...