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मिस व्हीलचेयर 2017 में भारत की ओर से दावेदारी पेश करेंगी डॉ राजलक्ष्मी

तर्कसंगत

September 26, 2017

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“लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं
मैं ने उस हाल में जीने की क़सम खाई है”
अमीर क़ज़लबाश की इन पंक्तियों को साकार कर दिखाया है डॉ राजलक्ष्मी ने जो मिस व्हीलचेयर 2017 में भारत की ओर से दावेदारी पेश करेंगी जिसका आयोजन पोलैंड में किया जा रहा है. पेशे से डेंटिस्ट डॉ. राजलक्ष्मी 2014 में मिस व्हीलचेयर इंडिया पीजेंट भी रह चुकी हैं.

साल 2007 में ने शनल कॉन्फ्रेंस में पेपर प्रेजेंट करने चेन्नै जा रहीं डॉ राजलक्ष्मी का रास्ते में ऐक्सिडेंट हो गया था. इस दुर्घटना में उन्हें स्पाइनल इंजरी हो गई थी और उनके पैरों को लकवा हो गया था. यह समय उनके लिए बेहद कठिन था क्योंकि एक के बाद एक कई सर्जरियों के बाद भी उनका पैर ठीक नहीं हुआ.

डॉक्टरों ने कहा दिया कि उन्हें जिंदगी भर व्हीलचेयर पर ही बैठना पड़ेगा. लेकिन राजलक्ष्मी का सोचना है कि शारिरिक विकलांगता उनके सपने को पूरा करने और खुद की पहचान बनाने में कोई बाधा नहीं है. वह इतनी सकारात्मक रहती हैं कि किसी को भी उनपर यकीन नहीं होता. उन्होंने हार मानने की बजाय साइकॉलजी और फैशन में अपनी रुचि को आगे बढ़ाया. उन्हें जब मिस वीलचेयर इंडिया की प्रतियोगिता के बारे में पता चला तो उन्होंने इसमें भाग लेने का फैसला किया और साल 2014 में इस प्रतियोगिता को जीतना उनके लिए किसी सपने के सच होने जैसा था.

राजलक्ष्मी का मानना है कि उन्हें एक ही जिंदगी में दो तरह की जिंदगी जीनो को मिल गई. उन्होंने अपनी मेहनत और शिद्दत के बलबूते डेंटल सर्जरी में मास्टर्स किया और उसमें गोल्ड मेडल भी हासिल किया. दुर्भाग्यवश गोल्ड मेडलिस्ट होने के बावजूद भी उन्हें उस वक्त नौकरी नहीं वहीं शारीरिक रूप से अक्षम होने के बावजूद उन्होंने अपनी डिग्री पूरी की उसके बाद साइकॉलजी, फैशन डिजाइिनंग, वेदिक योगा जैसे कोर्स भी किए.

भारत में दिव्यांगों की स्थिति के बारे में बात करते हुए राजलक्ष्मी कहती हैं, ‘भारत में सबसे बड़ी चुनौती इन्फ्रास्ट्रक्चर की है. मैं सब लोगों की मानसिकता को एक तराजू में नहीं तौलूंगी, लेकिन समाज में ऐसे भी लोग हैं जो विकलांगता को अलग नजरिए से ही देखते हैं. विकलांगता एक शब्द भर है जिसे एक स्थिति को बयां करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. विकलांगता मानसिक भी हो सकती है और शारिरिक भी.’ अंतर सिर्फ ये है कि शारीरिक विकलांगता को देखा जा सकता है, मानसिक को नहीं. वह बताती हैं कि भारत में विकलांगों की स्वीकार्यता काफी कम है. पोलैंड में आयोजित समारोह के लिए वह जल्द ही रवाना हो जाएंगी. वो कहती हैं की ये सफर उनके लिए मुश्किल तो ह।गा लेकिन उनके लिए इसकी अहमियत बहुत ज्यादा है.

आज वह न केवल एक डेंटल कॉलेज में असिस्टैंट प्रोफेसर हैं बल्कि खुद का डेंटल क्लीनिक भी चलाती हैं. उनके डेंटल क्लीनिक का नाम है एसजे डेंटल स्क्वॉयर. वह जेनेटिक्स रिसर्च प्रोजेक्ट का हिस्सा भी रही हैं और नेशनल कन्वेंशन्स में पेपर और पोस्टर प्रजेंट किये हैं. वह स्कूलों में जाकर बच्चों के लिए फ्री में डेंटल हैल्थ कैंप लगाती हैं और व्हीलचेयर वाले बच्चों के लिए अलग से ट्रेनिंग की भी व्यवस्था करती हैं.

 

वो एसजे फाउंडेशन की चेयरपर्सन भी हैं. उनका यह फाउंडेशन शारिरिक रूप से विकलांग लोगों की मदद करता है. 2014 में मिस व्हीलचेयर इंडिया का खिताब जीतने के बाद उन्होंने अगले साल ही अपने फाउंडेशन के जरिए मिस पीजेंट का आयोजन कराया था. उन्होंने व्हीलचेयर बास्केटबॉल और व्हीलचेयर डांस प्रोग्राम में भी हिस्सा लिया है. उनके काम को कई फोरम में सराहा जा चुका है और उन्हें कई सारे अवॉर्ड भी मिल चुके हैं.

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