मेरी कहानी

हमें बच्चा नहीं हो पा रहा था, फिर मैंने यात्रियों से सलाह लेनी शुरू की

तर्कसंगत

September 28, 2017

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मैं पहली बार इलाहाबाद से बंबई अपनी बहन से मिलने आया था. उस समय में दसवीं का छात्र था और मेरी स्कूली फ़ीस घर के बजट पर भारी पड़ रही थी. इसलिए मैंने तय किया कि बंबई में नौकरी करूंगा.

मैं अपनी बहन के क़रीब भी रहना चाहता था क्योंकि वो ही एक मेरी सच्ची दोस्त भी थी.

मैंने 1990 में कैब चलानी शुरू की और तब से ही मैं मुंबई के लोगों को प्यार करने लगा. उन्होंने और इस शहर ने मुझे बहुत कुछ दिया है.

मेरी पत्नी गर्भधारण नहीं कर पा रही थी और जिस तरह मैं आपसे बात कर रहा हूं इसी तरह मैंने एक यात्री से इस बारे में बात की.

उस लड़की ने मुझे बताया कि उसकी मम्मी डॉक्टर हैं और मेरी मदद कर सकती हैं. उसने मेरा नंबर लिया और बात की. अगर कम शब्दों में पूरी कहानी बताऊं तो मेरी बीवी कई सालों बाद गर्भधारण कर सकी और एक बेटे को जन्म दे सकी. ये सब उस लड़की और उसकी मां से मिली देखभाल की वजह से ही हो पाया.

वो मेरी ज़िंदगी का सबसे ख़ूबसूरत और सबसे ख़ुशहाल पल था. तब मैंने अपने आप से वादा किया था कि मैं भी दूसरे लोगों के काम आउंगा.

तो क्या कभी आप किसी की मदद कर पाए?

मैं नहीं जानता कि ये बड़ी बात है या नहीं. ये कुछ महीने पहले की बात है जब रात में करीब डेढ़ बजे शराब के नशे में धुत्त दो युवकों के पास रुका था.

वो लोग मेरी गाड़ी में बैठे और अंग्रेज़ी में बात करने लगे कि उनके पास किराया देने के लिए पैसे नहीं है. उस वक्त मैंने अपने बेटे के बारे में सोचा और मुझे महसूस हुआ कि यदि वो शराब पीकर बाहर कहीं सड़क पर भटक रहा होता तो मुझे कितना बुरा लगता.

मैंने उन दोनों लड़कों को धारावी में उनके घर तक छोड़ा. जब वो गाड़ी से उतरे तो उन्होंने कहा कि उनके पास सौ रुपए कम है. मैंने उनसे कहा कि कोई बात नहीं है और उन्हें इतनी ज़्यादा शराब न पीने की सलाह भी दी.

मैं जानता हूं कि सौ रुपए कोई बड़ी चीज़ नहीं है, लेकिन मैंने उन्हें घर छोड़ा क्योंकि मैं वाक़ई में उनकी सुरक्षा को लेकर चिंतित था.

तब से मैं कई बार रात में यूं ही गाड़ी लेकर निकलता हूं और ऐसे लोगों को मेरी नज़रें तलाशती रहती हैं जिनके पास पैसे न हों. मैं उन्हें सुरक्षित घर छोड़ता हूं भले ही इसमें कितनी ही देर क्यों न लग जाए.

जिस शहर ने मुझे सबकुछ दिया हो कम से कम मैं उस शहर के लिए इतना तो कर ही सकता हूं.

Courtesy: Humans of Bombay

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