मेरी कहानी

मेरी कहानीः मेरे पति ने कहा वेश्या बन जाओ, मां के पास गई तो उन्होंने भी घर से निकाल दिया

तर्कसंगत

September 29, 2017

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मैं जब अपने मां-बाप से दूर गांव में पल रही थी तब मैं ये जानती थी कि मेरे माता-पिता मुंबई में रहकर काम करते हैं ताकि हम भाई-बहनों की परवरिश हो सके.

जब मैं दस साल की हुई तो मुझे मुंबई बुला लिया गया और तब मुझे पता चला कि मेरे पिता एक शराबी हैं और मेरी मां को सोनापुर के रेड लाइट एरिया में काम करने के लिए मजबूर करते हैं.

मैं अपनी मां का बहुत सम्मान करती थी क्योंकि मैं जानती थी कि वो ये सब हमारे लिए कर रही हैं, अपने बच्चों का पेट भरने के लिए कर रही हैं.

लेकिन दुनिया ने मेरी कोमल हृद्य वाली मां को बहुत सख़्त बना दिया.

बहुत जल्द ही वो वेश्यावृत्ति के लिए बदनाम उस इलाक़े में एक जाना-पहचाना नाम और एक वेश्यालय की मालकिन बन गईं जो नई लड़कियों को पेशे में लाती थीं.

13 साल की उम्र में मेरी शादी एक ऐसे व्यक्ति से हो गई जो मेरे पिता जैसा ही था. वो हर रात मेरा शोषण करता और मुझे पीटता.

जब मैंने बच्चे पैदा कर दिए तो मुझे ये अहसास हुआ कि मेरा पति चाहता है कि मैं अपनी मां के साथ वेश्यालय में काम करूं.

मैं बहुत डर गई थी. मैंने उसकी पिटाई बर्दाश्त की लेकिन वेश्या बनने की बात नहीं मानी. ये अलग बात थी कि मेरा पति ख़ुद वेश्यालय जाने का आदी था.

जो हिंसा मेरे साथ होती रही थी वो मेरे बच्चों के साथ होने लगी और तब मुझे अहसास हो गया कि अब बहतु हुआ.

मैं अपने बच्चों को लेकर अपनी मां के घर पहुंची लेकिन उन्होंने मुझे आधी रात घर से बाहर निकाल दिया और कह दिया कि कभी वापस मत लौटना.

ना मेरे पास कोई पैसा था और न ही कहीं जाने का कोई ठिकाना. मैं स्टेशन चली गई और अपने बच्चों को बैंच पर सुला दिया.

मैं बहुत उदास और परेशान थी. कुछ सूझ नहीं रहा था. तब ही मुझे याद आया कि एक पूर्णता नाम की एनजीओ के लोग सोनापुर के हमारे घर आया करते थे और कहा करते थे कि कई ज़रूरत हो तो कॉल करना.

मैंने स्टेशन पर किसी से फ़ोन मांगा और उन्हें फ़ोन किया.

मैंने कहा, “दीदी मैं नूतन बोल रही हूं. मेरे पास कहीं रहने का कोई ठिकाना नहीं है, क्या आप मेरी मदद कर सकती हैं.”

इस फ़ोन कॉल के बाद उन्होंने किसी को मुझे लेने स्टेशन भेजा.

बीते दो महीनों में मेरा जीवन पूरी तरह बदल गया है. पहले मैं ग़ुलाम जैसी दूसरों पर निर्भर थी. अब मैंने ख़ुद पर विश्वास करना सीख लिया है और मैं स्वतंत्र हूं.

पूर्णता मेरे बच्चों को रेज़मर्रा के ख़र्च और शिक्षा ख़र्च का ज़िम्मा उठा रही है.

लेकिन मैं भविष्य में अपने बच्चों को अपनी मेहनत के दम पर पालना चाहती हूं.

मैं फिलहाल सिलाई का काम सीख रही हूं और उम्मीद है कि भविष्य में कभी न कभी कपड़े डिज़ाइन करना भी सीख जाऊंगी.

मैं इस लायक बनना चाहती हूं कि मैं भविष्य में अपने जैसी रेड लाइट इलाक़ों की औरतों को काम दे सकूं.

ये मेरा जवाब होगा उन सब लोगों को जिन्होंने मुझे तोड़ने की कोशिश की, मेरे बच्चों का शोषण करने की कोशिश की.

मैं एक मां हूं और अपने बच्चों के लिए हर जंग लड़ूंगी और ये सुनिश्चित करूंगी कि वो एक सुरक्षित माहौल में बड़े हों.

मैं अपने बच्चों को सिखाऊंगी कि कभी भी किसी भी हालात में किसी के आगे मत झुकना.

पूर्णता एक ग़ैर सरकारी संगठन है जो नूतन जैसी महिलाओं की ज़िंदगी बचाने के लिए काम कर रहा है. ये संगठन लोगों से मिले चंदे पर चलता है.

“Growing up in a village far away, I knew my parents were in Mumbai to earn a living for me and my siblings. At 10, my…

Nai-post ni Humans of Bombay noong Martes, Setyembre 26, 2017


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