मेरी कहानी

मेरी कहानीः रात में दो बजे वो किसी फ़रिश्ते की तरह मेरी मदद के लिए आया

तर्कसंगत

September 29, 2017

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मैं एक प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर हैदराबाद से लौटा था. मैंने रात दो बजे बैंगलुरू के कोर्पोरेशन सर्किल के पास शेयर कैब बुक की. लेकिन जब कैब पहुंच गई तब मुझे अहसास हुआ कि मैं अपना लगेज बस स्टैंड पर ही छोड़ आया हूं.

ये एक शर्मनाक परिस्थिति थी. बस को आए हुए आधा घंटा हो चुका था ऐसे में मुझे सामान मिलने की संभावना भी कम ही थी.

मैंने बस कंपनी को फ़ोन करके ड्राइवर का नंबर लिया और जब उससे बात की तो पता चला कि वो 25 किलोमीटर दूर जा चुका है और अब इंतेज़ार करने के बिलकुल मूड में नहीं है.

सबसे बड़ी समस्या ये थी कि वो सिर्फ़ तेलुगु जानता था और मैं सिर्फ़ हिंदी. इसी बीच कैब मुझे पिक करने पहुंच गई. चूंकी ये शेयरिंग कैब थी इसलिए ड्राइवर को अंतिम ड्रॉप पाइंट, जो मेरा कॉलेज था, तक जाना ही था.

मैंने ड्राइवर को परिस्थिति बताई और कहा कि मैं कैंसल कर के दूसरी कैब कर लूंगा. ड्राइवर ने तुरंत कहा कि अंदर बैठिए, पहले बस पकड़ते है.

वो ड्राइवर रात दो बजे किसी फ़रिश्ते की तरह आया था. वो तेलुगू जानता था और फिर उसने ही फ़ोन पर ड्राइवर से बात की. क़रीब तीस किलोमीटर के तेज़ रफ़्तार सफर के बाद हमने बस पकड़ ली.

मुझे मेरा लगेज मिल गया. फिर हम मेरे कॉलेज हॉस्टल की ओर गए जो करीब पचास किलोमीटर दूर था.
उस टैक्सी ड्राइवर ने न सिर्फ़ मुझे मेरे हॉस्टल छोड़ा बल्कि बस पकड़ने के लिए चली गई दूरी के लिए अतिरिक्त पैसा भी नहीं मांगा.

उन्होंने याद करते हुए बताया कि कैसे एक बार उन्होंने अपना बैग ऐसी ही एक घटना में खो दिया था. उनके बैग में ज़रूरी और क़ीमती सामान था.

मेरे कई बार कहने पर भी उन्होंने अतिरिक्त पैसे नहीं लिए और कोर्पोरेशन सर्किल से हॉस्टल तक का किराया ही लिया.

उन्होंने मुझे सहानुभूति और आभार की भावना के मायने समझा दिए. मैं इसके लिए हमेशा उनका शुक्रगुज़ार रहूंगा.

-वैभव व्यास,  Humans of PES से साभार


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