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ईमानदारी और सादगी की मिसाल थे पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री

तर्कसंगत

October 2, 2017

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भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री जी की ईमानदारी और सादगी से हर कोई वाकिफ है. लालबहादुर जी ने अपना जीवन बेहद सादगी से जिया.

लालबहादुर शास्त्री इतने ईमानदार थे कि उन्‍होंने कभी भी प्रधानमंत्री के तौर पर उन्‍हें मिली हुई गाड़ी का निजी काम के लिए इस्‍तेमाल नहीं किया.

एक बार उनके पुत्र सुनील शास्त्री किसी निजी काम के लिए इंपाला कार ले गए और वापस लाकर चुपचाप खड़ी कर दी. शास्त्री जी को जब पता चला तो उन्होंने ड्राइवर को बुलाकर पूछा कि कितने किलोमीटर गाड़ी चलाई गई ? और जब ड्राइवर ने बताया कि चौदह किलोमीटर, तो उन्होंने निर्देश दिया कि लिख दो, चौदह किलोमीटर प्राइवेट यूज. शास्त्री जी यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने अपनी पत्नी को बुलाकर निर्देश दिया कि उनके निजी सचिव से कह कर वह सात पैसे प्रति किलोमीटर की दर से सरकारी कोष में पैसे जमा करवा दें.

एक बार शास्त्री जी कपड़े की एक दुकान में साड़ियां खरीदने गए. दुकान का मालिक शास्त्री जी को देख कर बहुत खुश हो गया. उसने उनके आने को अपना सौभाग्य माना और उनका स्वागतसत्कार किया. शास्त्री जी ने उससे कहा कि वे जल्दी में हैं और उन्हें चारपांच साड़ियां चाहिए. दुकान का मैनेजर शास्त्री जी को एक से बढ़कर एक साड़ियां दिखाने लगा. सभी साड़ियां काफी कीमती थीं. शास्त्री जी बोलेभाई, मुझे इतनी महंगी साड़ियां नहीं चाहिए. कम कीमत वाली दिखाओ.

शोरूम के मालिक ने उनका आदर करते हुए कहा कि आप तो प्रधानमंत्री हैं ये साड़ी में आपको उपहार में दे दूंगा. शास्त्री जी ने बड़ी सादगी से उत्तर देते हुए कहा कि मेरी जितनी हैसियत है उतनी की ही मैं साड़ी खरीदूंगा लेकिन भेंट नहीं लूंगा.

मैनेजर को एकदम सस्ती साड़ी दिखाने में संकोच हो रहा था। शास्त्री जी इसे भांप गए. उन्होंने कहादुकान में जो सबसे सस्ती साड़ी हो वो दिखाओ मुझे वही चाहिए. आखिरकार मैनेजर ने उनके मन मुताबिक साड़ियां निकालीं. शास्त्री जी ने उनमें से कुछ चुन लीं और उनकी कीमत अदाकर चले गए.

लोग शास्त्री जी की मिसाल ईमानदारी के लिए कई जन्मों तक याद रखेंगे. क्योंकि वो इतने ईमानदार थे कि एक बार उन्होंने अपने बेटे के गलत तरीके से प्रमोशन को रद्द करवा दिया था


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