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विज्ञापन के मोहताज नहीं थे पत्रकार मोहनदास करमचंद गांधी

Poonam

October 2, 2017

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बीसवीं सदी की शुरुआत में जब गांधी जी को भारत में कोई नहीं जानता था तब गांधी जी ने अफ्रीका में अपनी वकालत के ज़रिये अश्वेत लोगों को उनका हक़ दिलाने की कोशिश की. इसी प्रक्रिया में एक बार, वहां के एक कोर्ट परिसर में गांधी जी को पगड़ी पहनने से मना कर दिया गया. कहा गया कि उन्हे केस की कार्रवाई बिना पगड़ी के करनी होगी. गांधी जी ने पगड़ी उतार दी, केस लड़ा लेकिन वो इस मुद्दे को आगे ले जाने का मन बना चुके थे.

गांधी जी ने डरबन के एक स्थानीय संपादक को खत लिखकर इस मामले पर अपना विरोध जताया. विरोध के तौर पर लिखी उनकी चिट्टी को अख़बार में जस का तस प्रकाशित किया गया. ये पहली बार था जब गांधी जी का कोई लेख अख़बार में प्रकाशित हुआ था. इस में उन्होंने लिखा कि किसी भी देश में ऐसा कानून नहीं हो सकता जो किसी की व्यक्तिगत या सांस्कृतिक आज़ादी के खिलाफ हो. इस लेख के बाद पगड़ी पर रोक लगाने वाले कोर्ट के कार्यवाहक को कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी और इसी विरोध की अभिव्यक्ति से शुरु हुआ था गांधी जी की पत्रकारिता का सफ़र.

वो वक्त था साल 1903 जब गांधी ने अफ्रीका में हीइन्डियन ओपिनियनका प्रकाशन शुरु करवाया. इस अख़बार ने उस दौर के रंगभेद समेत ऐसे कई मुद्दों को प्रकाशित किया जिनपर दूसरे अख़बार बात करने से घबरा रहे थे. गांधी जी के सत्ता से बेख़ौफ अंदाज़ का पता इससे भी चलता है कि उस दौर में उन्होनें इस अख़बार को पांच भारतीय भाषाओं में प्रकाशित किया, संपादक रहते हुए उन्होने कभी भी अख़बार के लिए कोई विज्ञापन नहीं लिया.

संपादकीय पन्ने पर उनके लेख धीरेघीरे हर तरफ गूंजने लगे और ये वही वक्त था जब गांधी जी एक पत्रकार के तौर पर पूरी तरह स्थापित हो गए थे. गांधी के लिए पत्रकार होना किसी चुनौती से कम नहीं था। सत्ता के विरोध में आवाज़ बुलंद करने पर साल 1906 में अफ्रीकी प्रशासन ने उन्हें जोहान्सवर्ग की जेल में बंद कर दिया. लेकिन जेल में रहने के बावजूद भी गांधी जी ने सच के साथ समझौता नहीं किया, बल्कि जेल से ही अख़बार का संपादन का काम किया. यहीं से शुरु हुआ गांधी जी का पत्रकारिता का सफ़र दूर तक चला. भारत की आज़ादी की लड़ाई के दौरान भी उन्होने अख़बार का इस्तेमाल किया. उन्होनेहरिजननाम से तीन समाचार पत्रों का संपादन किया जिसने भारतीयों को अंग्रेज़ों के खिलाफ एकजुट होने में मदद की.

कुछ ऐसे ही गांधी जी ने पत्रकारिता की शुरुआत की और कभी भी सच के लिए समझौता नहीं किया.


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