सप्रेक

सप्रेकः डॉक्टर नहीं हैं गुरमीत सिंह फिर भी मरीज़ों के लिए भगवान हैं

तर्कसंगत

October 3, 2017

SHARES

क्या आप तकलीफ़ में हैं? गुरमीत सिंह जब पटना के सरकारी अस्पताल में भर्ती लावारिस लोगों से मिलते हैं तो उनकी ज़बान पर यही सवाल होता है.

बदहाल अस्पताल में भर्ती लावारिस लोगों के लिए गुरमीत सिंह किसी मसीहा से कम नहीं हैं.

जिस बदबूदार वार्ड में डॉक्टर भी मुंह पर रूमाल रखकर आते हैं उसमें जब गुरमीत पहुंचते हैं तो उनके चेहरे पर मुस्कान होती है.

पटना के अस्पताल के लावारिस वार्ड में जो मरीज़ ठीक हो जाते हैं उन्हें या तो सुधार गृह भेज दिया जाता है या वो फिर से सड़कों पर लौट जाते हैं.

यहां उन मरीज़ों को ही भर्ती किया जाता है जिनका दुनिया में कोई नहीं होता. न परिवार न ही रिश्तेदार.

कई लोग यहां महीनों तक भर्ती रहते हैं. गुरमीत सिंह जब इस वार्ड में पहुंचते हैं तो यहां भर्ती मरीज़ों की आंखें चमक जाती हैं.

उन्हें लगता है कि उनका कोई अपना उनसे मिलने आ पहुंचा है.

60 साल के गुरमीत दिन भर शहर के बाज़ार में स्थित अपनी कपड़ों की दुकान चलाते हैं और शाम होते ही खाने-पीने की चीज़ें लेकर अस्पताल के लावारिस वार्ड में पहुंच जाते हैं. वे मरीज़ों के लिए दवाएं भी लेकर आते हैं.

बीते दो दशकों से हर दिन वो ये काम कर रहे हैं.

मानव सेवा के प्रति सिंह के जज़्बे को इस बात से समझा जा सकता है कि उन्होंने बीते करीब चौदह सालों से पटना से बाहर की कोई यात्रा नहीं की है.

कभी भी कोई छुट्टी नहीं ली है. उन्होंने कभी भी इन लावारियों की सेवा करने के अपने काम में नागा नहीं किया है.

गुरमीत सिंह का घर पटना मेडिकल कॉलेज और हॉस्पीटल के सामने ही स्थित के बहुमंज़िला इमारत में हैं जहां वो अपने पांच भाइयों के परिवार के साथ रहते हैं.

हर रात जब गुरमीत अस्पताल के लिए निकलते हैं तो अपनी जेब में मरीज़ों की दवा के लिए पैसे रखना नहीं भूलते.

पांचों भाई अपनी कमाई का दस फ़ीसदी लावारिस मरीजों की देखभाल के लिए सुरक्षित रखते हैं.

गुरमीत मरीज़ों के लिए ब्रेड, सब्ज़ी, कढ़ी आदि ख़रीदते हैं.

गुरमीत सिंह सिर्फ़ मरीज़ों को खाने-पीने की चीज़े ही नहीं देते हैं बल्कि ये भी देखते हैं कि उनका इलाज ठीक चल रहा है या नहीं. वो नर्स और डॉक्टरों से उनके बारे में बात भी करते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि मरीज़ों के लिए दवाइयां मौजूद हैं.

ज़रूरत पड़ने पर वो अपने पैसों से ख़रीदकर मरीज़ों को दवाइयां उपलब्ध करवाते हैं.

गुरमीत जहां अपनी ओर से लावारिस मरीज़ों की सेवा करने की हर संभव कोशिश करते हैं लेकिन सरकार और अस्पताल प्रशासन के रवैये को देखकर वो परेशान से लगते हैं.

बीबीसी ने #unsungindians सीरीज़ के तहत गुरमीत की कहानी को प्रकाशित किया था.

बीबीसी से बात करते हुए गुरमीत सिंह ने कहा था, “इन लोगों को थोड़ी इज़्ज़त और देखभाल की ज़रूरत है. सरकार ये चीज़ें उनको मुहैया नहीं करा पाई है. बीते 22 साल से मैं यहां आ रहा हूं. इस वॉर्ड में कुछ भी नहीं सुधरा है. कुछ भी नहीं.”

गुरमीत ने लावारिस मरीज़ों की देखभाल क्यों शुरू की.

दो दशक पुराने वाक्ये को याद करते हुए वो बताते हैं, “उस दिन बहुत गर्मी थी. उनकी आंखों में आंसू था. मैंने उनके बच्चे को देखा, वह झुलसा हुआ था.मैं उन्हें अस्पताल ले गया, लेकिन वहां कोई इलाज करने वाला नहीं था. डॉक्टर हड़ताल पर थे. ग़रीब और लावारिस लोग सबसे ज़्यादा प्रभावित थे. मैं काफ़ी ग़ुस्से में था. मैंने उसी समय इन लोगों के लिए कुछ करने का फ़ैसला लिया.”

स्रोतः बीबीसी हिंदी


Contributors

Edited by :

अपने विचारों को साझा करें

संबंधित लेख

लोड हो रहा है...