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उस मासूम की सिसकियों शोर क्यों नहीं बन पाईं?

Poonam

October 8, 2017

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राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटे फ़रीदाबाद की ऊंची रिहायशी इमारत. इमारत में रहती दो लड़कियां. एक धनाड्य परिवार की इंजीनियरिंग की छात्रा. दूसरी बंधुआ मज़दूर की तरह रखी गई एक नाबालिग बच्ची.

अक्तूबर के पहले सप्ताह में नाबालिग बच्ची ने 11वीं मंज़िल से छलांग लगाकर ‘ख़ुद को बचाने’ की कोशिश की.

ऐसा क्या उस नाबालिग के साथ हुआ होगा कि उसे मौत का डर भी ये ख़तरनाक छलांग लगाने से नहीं रोक सका?

नाबालिग बच्ची की क़िस्मत अच्छी थी कि वो दसवीं मंज़िल में लगी जालियों में अटक गई. कई घंटों की मशक्कत के बाद बच्ची को बचाया जा सका.

बच्ची के जिस्म पर चोट और जलाने के निशान उस शोषण की गवाही दे रहे थे जिससे वो लंबे समय से गुज़र रही थी.

बच्ची की ‘मालकिन’ मूलरूप से पटना की रहने वाली है और फरीदाबाद के एक निजी विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रही है.

इस नाबालिग बच्ची को घरेलू काम करने के लिए रखा गया था. इसके ऐवज़ में कोई वेतन उसे नहीं दिया जाता था. वो बिना वेतन के क़रीब दो साल से यहां बंधुआ थी.

बच्ची ने जो कहानी मीडिया को बताई है उसके मुताबिक उसे पढ़ाने के बहाने लाया गया था.

बच्ची ने मीडिया से कहा कि वो किसी भी तरह इस शोषण से आज़ादी चाहती थी.

इस रिहायशी इमारत में रहने वाले अन्य लोगों ने कई बार बच्ची को बुरी हालत में देखा लेकिन उसने कभी कुछ कहा नहीं.

नाबालिग लड़की ख़ामोशी से ज़ुल्म सहती रही और किसी ने उसका हाल पूछने की ज़रूरत नहीं समझी.

पुलिस ने नाबालिग लड़की का शोषण करने वाली छात्रा को गिरफ़्तार कर लिया है. बच्ची को चाइल्ड वेलफ़ेयर समिति को सौंप दिया गया है.

लेकिन इस घटना से जो सवाल उठे हैं उनका जवाब मिलना अभी बाक़ी है.

कुछ राष्ट्रीय अख़बारों को छोड़कर ये घटना मेनस्ट्रीम मीडिया में जगह नहीं पा सकी.

केंद्रीय महिला और बाल कल्याण मंत्री मनेका गांधी ने ज़रूर इस घटना पर ट्वीट करके अफ़सोस ज़ाहिर किया.

ऐसी घटनाएं सरकार या प्रशासन के बजाए हमारे समाज पर अधिक सवाल उठाती हैं.

हमारे बीच में शोषण होता रहता है और कोई बचाने के लिए आगे नहीं आता.

जिस पर ज़ुल्म हो रहा है वो कई बार इस स्थिति में नहीं होते कि बोल पाएं लेकिन जो लोग आसपास होते हैं वो क्यों ऐसे शोषण के संकेतों को नहीं समझ पाते?

उस मासूम की सिसकियों को कोई क्यों नहीं सुन पाया?

और वो कौन सी मानसिकता है जो एक इंसान को ख़ुद को दूसरे इंसान का ‘मालिक’ समझने के लिए प्रेरित करती है?

इक्कीसवीं सदी में एक ओर भारत विश्वगुरू बनने का सपना देख रहा है और दूसरी ओर ये भयावह हक़ीक़त है.

देश की बेटियां ग़ुलामी जैसा जीवन जीनें के लिए मजबूर हैं. हमें ठहरकर ख़ुद से पूछना होगा कि ग़लती कहां हो रही है?


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