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गुजरात की घटना के बाद दलित युवकों में बढ़ा मूंछें रखने का क्रेज

तर्कसंगत

October 10, 2017

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अवधेश चौधरी

गुजरात की घटना के बाद दलित युवकों में बढ़ा मूंछें रखने का क्रेज गुजरात में एक दलित युवक के इस्टाइलिश मूंछे रखने पर हुई पिटाई के बाद मामला तूल पकड़ता जा रहा है. घटना के बाद जमीनी स्तर से लेकर सोशल मीडिया में अपना विरोध दर्ज करा चुके दलित युवक अब अलग- अलग तरीके से जातिवाद का विरोध कर रहे हैं.

युवकों का कहना है कि अब तक मूंछे नहीं रखते थे लेकिन अब कोई रोक कर दिखाए. घटना के बाद से जो युवक शोकिया ही मूंछ रखते थे अब वो भी मूंछ रखने लगे हैं.

गुजरात में अहमदाबाद से एमसीए कर रहे जितेंद्र कुमार ने अपनी मूंछों वाली तस्वीर के साथ एक ऑडियो क्लिप भेजा है. उन्होंने कहा कि इस देश में सभी सामान हैं, सभी स्वतंत्र हैं, यहां कोई किसी का गुलाम नहीं है. मनुष्य को क्या पहनना है कैसे रहना है यह वह स्वयं तय करता है. लेकिन गुजरात में जो हो रहा है वह दयनीय है. उन्होंने कहा कि गुजरात से बाहर के लिए यह बात नयी हो सकती है लेकिन गुजरात में जातिवाद की जो स्थिति है वह दिल्ली में बैठा व्यक्ति सोच भी नहीं सकता है.

जितेंद्र ने कहा कि गुजरात के शहरों में तो कुछ ठीक है लेकिन गांव के इलाकों में आज भी आजादी से पहले की स्थिति है. यहां रोज हमारे मौलिक अधिकारों का हनन होता है. उन्होंने कहा कि अपने को स्वर्ण कहने वाले लोग हमें जबरदस्ती गुलाम बनाने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने कहा मूंछे रखने पर दलित युवक की पिटाई से पूरा देश शर्मसार है लेकिन गुजरात में लोगों पर कोई फर्क नहीं पड़ता है.

वह आगे कहते हैं कि कहने को तो भारत विविधता में एकता का देश है. यहां सभी जाति-धर्म के लोग रह सकते हैं. लेकिन गुजरात में लगातार दलितों पर हो रहे हमले कुछ और ही दर्शाते हैं.

वहीं गुजरात के विद्या मंदिर इंग्लिश मीडियम बीएड कालेज पालनपुर से बीएड की पढ़ाई कर रहे एक और युवक मुकेश कुमार परमार ने अपनी मूंछों वाली तस्वरी भेजी है. उन्होंने कहा कि जो हक हमें संविधान से मिला है उसे छीनने की कोशिश की जा रही है. मूंछे तो छोड़िए लोग हमें अच्छे कपड़े तक नहीं पहनने देते. टाई-कोट का तो हम सोच भी नहीं सकते. चाहें हम कितने भी पढ़े लिखे क्यों न हों.

हम यहां अच्छी बाइक तक नहीं चला सकते हैं खरीद भी लेंगे तो उसे तोड़ दिया जाता है. हम मंदिरों में भी नहीं जा सकते हैं. यहां तक की हम स्वतंत्रता से कोई भी काम नहीं कर सकते. मुकेश कहते हैं कि अपने आप को ऊंची जाति का समझने वालों के घर अगर कुत्ता चला जाए तो कोई बात नहीं लेकिन अगर गलती से भी कोई दलित चला जाता है तो उसकी खैर नहीं.

वहीं यूपी के अमरोहा से अंकुर शेट्ठी ने अपनी मूछों वाली तस्वीर भेजी है. उन्होंने कहा कि ठाठ से रहना, मर्जी के कपड़े पहनना व्यक्ति का अधिकार है इन अधिकारों का हनन करने वालों को फौरन जेल में डालना चाहिए. वह कहते हैं कि मूंछों पर रोक लगाने वाले जातिवाद के कीड़े जो उनके दिमाग में पल रहे हैं उसको मारने के लिए सख्त उपाय और सख्त कानून का निर्माण करना चाहिए.

मूंछों पर शुरु हुई जंग के खिलाफ कई युवाओं ने अपनी-अपनी तस्वीरें भेजकर इसका कड़ा विरोध किया है. गुजरात से 15 किमी दूर गांधीनगर के कालोत तालुका के लिंबोदरा गांव के रहने वाले युवक पीयूष परमार को सिर्फ इसलिए पीटा गया कि उसने मूंछे रखी थीं. आरोपियो का तर्क था कि वह नीची जाति का होने के बावजूद मूंछे कैसे रख सकता है.

लेकिन दलित युवकों ने इसका विरोध करते हुए अब और भी लंबी मूंछ रखने की बात कही है. उनका कहना है कि अब नहीं रखते थे लेकिन अब जरुर रखेंगे कोई रोक कर दिखाए. लेकिन मूंछ रखने या और बड़ी मूंछ रखने से तो मामले का हल नहीं निकल जाता है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी गुजरात से ही आते हैं. वो अपने भाषणों में दलितों को रिझाने के लिए बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के नाम का खूब गुणगान करते हैं. लोगों को उनके संघर्ष की कहानी सुनाते हैं. लेकिन देश में दलितों पर हो रहे अत्याचारों पर कभी बात नहीं करते हैं. यह कोई पहली घटना नहीं है इससे पहले ऊना की घटना ने पूरे देश को शर्मसार किया है. वोट के नाम पर राजनीतिक दलों के नेता दलितों के घर खाना खाने तो चले जाते हैं लेकिन इन पर हो रहे हमलों के खिलाफ कभी सड़कों पर नहीं उतरते हैं.

क्या कोई किसी को सिर्फ मूंछ रखने पर उसकी पिटाई कर देता है. क्या किसी दलित को सिर्फ इसलिए मार दिया जाता है कि वह गरबा देख रहा था. हम आजादी के 70 वर्षे के बाद भी कैसा भारत बना रहे हैं. मेरा मानना है हमारे देश के नेताओं को आगे आकर समाज में घूल रहे इस जातिवाद के जहर के खत्म करने की पहल करनी चाहिए. वोट के लिए दलितों के घर खाना खाने जैसे दिखावे से बचकर जमीन पर हो रहे अत्याचार को रोकने के लिए मुहिम चलानी चाहिए. अगर ऐसा नहीं हुआ तो आगे चलकर हालात इससे भी गंभीर होंगे.


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